ईरान युद्ध में अमेरिका और इजराइल ने किया एआई और इलेक्ट्रॉनिक हथियारों का घातक इस्तेमाल, संचार व्यवस्था ठप कर रडार को किया अंधा

नई दिल्ली | ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल के संयुक्त सैन्य अभियान ने आधुनिक युद्धकला की परिभाषा बदल दी है। इस संघर्ष में ‘काइनेटिक’ हथियारों यानी मिसाइलों के इस्तेमाल से पहले ‘इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर’ (EW) के जरिए ईरान के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सुरक्षा घेरे को ध्वस्त किया गया। अमेरिकी नेवी के विशेष विमान ‘EA-18G ग्रोलर’ और एफ-35 स्टील्थ फाइटर्स ने ईरानी रडार और संचार प्रणालियों को पूरी तरह जाम कर दिया, जिससे ईरान की इंटरनेट कनेक्टिविटी महज 4 प्रतिशत पर सिमट गई। वहीं, इजराइल ने साइबर-साइकोलॉजिकल ऑपरेशन के तहत स्थानीय ऐप्स को हैक कर नागरिकों तक सीधे संदेश पहुँचाए। यह रणनीति दर्शाती है कि भविष्य के युद्धों में जमीन या आसमान से पहले ‘स्पेक्ट्रम’ पर नियंत्रण पाना जीत की पहली शर्त बन गया है।

सीमित संसाधनों के बावजूद ईरान ने ‘एसिमेट्रिक वॉरफेयर’ (असमान युद्ध) के जरिए करारा जवाब दिया है। ईरान ने होर्मुज की खाड़ी जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप का सहारा लिया, जिससे 1100 से अधिक कमर्शियल जहाजों का नेविगेशन सिस्टम फेल हो गया। ‘जीपीएस स्पूफिंग’ की इस तकनीक से जहाजों के ऑनबोर्ड सिस्टम ने उनकी गलत लोकेशन दिखाई, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन और तेल के बाजार में हड़कंप मच गया। इसके अलावा, ईरान ने अपनी स्वदेशी ‘सैय्यद-4’ इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर प्रणाली का उपयोग कर दुश्मन के नेविगेशन को बेअसर करने की कोशिश की। यह प्रणाली विशेष रूप से ईरानी महिला इंजीनियरों द्वारा विकसित की गई है, जो ईरान की तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनकर उभरी है।

ईरान संकट ने दुनिया भर के देशों को अपने डिजिटल और डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा के प्रति सचेत कर दिया है। भारत इस दिशा में ‘संयुक्ता’ और ‘शक्ति’ जैसे उन्नत इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के साथ अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। डीआरडीओ द्वारा विकसित ‘शक्ति’ सिस्टम भारतीय नौसेना के युद्धपोतों को आधुनिक रडार और एंटी-शिप मिसाइलों के खिलाफ एक अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान करता है। इसके साथ ही, पहाड़ी इलाकों के लिए ‘हिमशक्ति’ और राफेल विमानों में लगा ‘स्पेक्ट्रा सूट’ भारत की रक्षात्मक क्षमता को बढ़ाते हैं। निष्कर्ष यह है कि जो राष्ट्र अपने संचार और नेविगेशन सिस्टम की रक्षा नहीं कर सकते, वे पारंपरिक सेना होने के बावजूद रणनीतिक रूप से बेहद कमजोर साबित हो सकते हैं।

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