पश्चिम एशिया संकट और बढ़ती लागत से टेलीविजन उद्योग पर छाया संकट, महंगे हो सकते हैं टीवी सेट, कच्चे माल और समुद्री ढुलाई की कीमतों में उछाल से बिक्री घटने की आशंका, छोटे मॉडल चुन रहे ग्राहक

नई दिल्ली | टेलीविजन उद्योग इन दिनों दोहरी मार झेल रहा है, जहां एक ओर पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव ने समुद्री ढुलाई (फ्रेट) को महंगा कर दिया है, वहीं दूसरी ओर रैम और प्लास्टिक जैसे कच्चे माल की कीमतों में भी जबरदस्त उछाल आया है। डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी ने इस संकट को और गहरा कर दिया है, जिससे घरेलू स्तर पर टीवी का उत्पादन काफी महंगा हो गया है। सुपर प्लास्ट्रोनिक्स (SPPL) के सीईओ अवनीत सिंह मारवाह के अनुसार, पिछले छह महीनों में कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसके परिणामस्वरूप 9,000 रुपये में मिलने वाला 32 इंच का बेसिक टीवी अब 11,000 रुपये के पार पहुँच गया है।

बढ़ती कीमतों का सीधा असर अब ग्राहकों की पसंद और उनके बजट पर दिखने लगा है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि जो ग्राहक पहले 55 इंच का बड़ा टेलीविजन खरीदने की योजना बना रहे थे, वे अब बजट बिगड़ने के डर से 50 इंच के मॉडल की ओर रुख कर रहे हैं। इसी तरह, प्रीमियम सेगमेंट में भी 65 इंच की जगह 55 इंच के टीवी की मांग बढ़ गई है। हालांकि बड़ी कंपनियों ने अभी तक लागत का पूरा बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला है और बाजार में अपनी हिस्सेदारी बचाने के लिए कुछ नुकसान खुद वहन कर रही हैं, लेकिन इसके बावजूद मध्यम वर्ग के उपभोक्ता अपनी खरीदारी टाल रहे हैं।

हायर इंडिया के अध्यक्ष एन.एस. सतीश ने बताया कि बाजार में छोटे मॉडल की ओर झुकाव जरूर है, लेकिन आसान किस्त योजनाओं (EMI) के कारण बड़े परदे वाले टीवी की मांग अभी भी टिकी हुई है। कंपनियों का लगभग आधा कारोबार मासिक किस्तों पर आधारित है, जिससे कीमतों में बढ़ोतरी का तात्कालिक असर ग्राहकों पर कम पड़ता है। फिलहाल, उद्योग जगत को उम्मीद है कि साल के दूसरे हिस्से में आने वाले त्यौहारी सीजन के दौरान मांग में सुधार होगा। हालांकि, जब तक वैश्विक स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला और कच्चे माल की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तब तक टेलीविजन उद्योग के लिए चुनौतियां बरकरार रहने वाली हैं।

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