
ग्वालियर। जाने माने तबला और पखावज वादक मुन्नालाल भट्ट का निधन हो गया। संगीत जगत का कहना है कि उनका जाना संगीत की एक और मद्धिम होती लौ का बुझ जाना है। वे केवल एक श्रेष्ठ तबला और पखावज वादक ही नहीं, बल्कि सादगी की सजीव मिसाल थे। आज के दिखावटी और आडंबरपूर्ण प्रस्तुतियों के दौर में उनका व्यक्तित्व किसी शांत सरिता की तरह था। न कोई लटक-झटक, न प्रदर्शन का आग्रह, बस साधना की सौम्य आभा। सादा वेश, सहज व्यवहार और भीतर से उपजी विनम्रता -उनकी पहचान यही थी। उनका वादन सुनना एक अलग ही अनुभव होता था। तबले के बोलों की शुद्धता, स्पष्टता और नफ़ासत उनके हाथों में जैसे जीवंत हो उठती थी। वे लय पर सवार होकर नहीं, बल्कि लय के साथ एकाकार होकर वादन करते थे- जिसमें एक गहरी ‘चैनदारी’ और आत्मिक संतुलन झलकता था। यह कला किसी बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि भीतर की साधना से उपजती है। वे पारंपरिक घराने की उस विरासत के वाहक थे, जहाँ कला को बाज़ार नहीं, साधना माना जाता है। उनका हर स्पर्श, हर संगत अपने आप में एक सीख थी। उनके भाई रज्जन उस्ताद भी इसी परंपरा के साधक रहे, दोनों ने मिलकर संगीत की उस धारा को जिया, जिसे शब्दों में नहीं, केवल अनुभव में समझा जा सकता है।
मुन्नालाल जी ने तबला वादन को पेशे के रूप में भले पूरी तरह न अपनाया हो, पर ग्वालियर में लिटिल बैले ट्रूप से लेकर शहर की छोटी-छोटी सभाओं तक, उनकी उपस्थिति हमेशा गरिमा से भरी रही। वे अवसरों के पीछे नहीं भागे और शायद यही उनका स्वाभिमान था। उनकी थाप भले अब न सुनाई दे, पर उसकी गूंज संगीत-प्रेमियों के हृदय में लंबे समय तक बनी रहेगी।
