
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने गेस्ट फैकल्टी के नियमितीकरण को लेकर दायर एक बड़ा फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरी में स्थायी नियुक्ति केवल नियमों और वैधानिक प्रक्रिया के तहत ही संभव है। लंबे समय तक संविदा या गेस्ट फैकल्टी के रूप में काम करने से स्वत: नियमितीकरण या स्थाई दर्जा पाने का अधिकार नहीं बनता है। उक्त मत के साथ जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने प्रदेश भर के 291 गेस्ट फैकल्टीज (सहायक प्राध्यापकों, स्पोट्र्स ऑफिसर्स और लाइब्रेरियन) की याचिकाएं खारिज कर दीं।
दरअसल पन्ना निवासी कमल प्रताप सिंह व 290 अन्य की ओर से याचिका दायर कर मांग की गई थी कि उन्हें उनकी प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से स्थायी किया जाए। सभी सेवा लाभ दिए जाएं। साथ ही यह मांग भी की गई थी कि राज्य सरकार द्वारा जारी नई भर्ती विज्ञापन को निरस्त किया जाए। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि वे पिछले 20 वर्षों से अधिक समय से मध्यप्रदेश के विभिन्न शासकीय कॉलेजों में कार्यरत हैं। वे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के सभी आवश्यक मानकों को पूरा करते हैं और नियमित शिक्षकों की तरह ही पढ़ाई, परीक्षा, मूल्यांकन और प्रशासनिक कार्य करते हैं। इसके बावजूद उन्हें प्रतिमाह एक निश्चित मानदेय दिया जा रहा है। हर साल 89 दिन का अनुबंध बनाकर सेवा समाप्त कर दी जाती है और फिर नई चयन प्रक्रिया के माध्यम से दोबारा नियुक्ति की जाती है। वहीं राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि सरकार पहले ही गेस्ट फैकल्टीज को कई महत्वपूर्ण राहत और अवसर दे चुकी है, लेकिन नियमों के विरुद्ध किसी भी प्रकार का नियमितीकरण न तो संभव है और न ही संवैधानिक। उन्होंने कहा कि गेस्ट फैकल्टी को अधिकतम आयु सीमा में छूट दी गई है, ताकि वे नियमित भर्ती प्रक्रिया में आसानी से भाग ले सकें। इसके अलावा, उनके अनुभव को मान्यता देते हुए प्रति वर्ष 4 अंक का अतिरिक्त वेटेज दिया जाता है, जो अधिकतम 20 अंकों तक सीमित है। यह प्रावधान विशेष रूप से इसलिए किया गया है ताकि लंबे समय से कार्यरत गेस्ट फैकल्टी को प्रतिस्पर्धा में लाभ मिल सके। इसके अलावा राज्य सरकार ने गेस्ट फैकल्टी के हितों को ध्यान में रखते हुए 25 प्रतिशत होरिजोन्टल रिजर्वेशन भी प्रदान किया है। सरकार की ओर से न्यायालय को बताया गया कि कॉलेजों में सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति एक विधिवत गठित आयोग के माध्यम से की जाती है। यह प्रक्रिया नियमों के अनुसार होती है और इससे चयन में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित होती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी भी प्रकार की नियुक्ति नियमों के विपरीत की जाती है, तो वह मनमानी मानी जाएगी और संविधान के विरुद्ध होगी। जिसके बाद न्यायालय ने दायर याचिकाएं खारिज कर दी।
