बरगी डैम में हुआ यह दर्दनाक हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि लापरवाही, अव्यवस्था और जिम्मेदारियों से पलायन का जीवंत उदाहरण है. नौ लोगों की मौत और 15 लोगों का लापता होना किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि मानवजनित त्रासदी है, जिसे टाला जा सकता था. सबसे बड़ा सवाल यही है,जब मौसम विभाग ने 50 किमी प्रति घंटा की आंधी का स्पष्ट अलर्ट जारी कर दिया था, तो आखिर किसके आदेश पर क्रूज को पानी में उतारा गया ?
यह केवल एक निर्णय की चूक नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता है. ‘सेफ नेविगेशन’ जैसे बुनियादी सिद्धांतों की खुलेआम अनदेखी की गई. क्या पर्यटन विभाग और क्रूज ऑपरेटर के लिए यात्रियों की जान इतनी सस्ती है कि चेतावनियों को कागज का टुकड़ा समझ लिया जाए ? यह सीधे-सीधे आपराधिक लापरवाही का मामला बनता है. इसमें भी चौंकाने वाली बात यह है कि इनलैंड वेसल्स एक्ट, 2021 के स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद अधिकांश यात्रियों को लाइफ जैकेट नहीं पहनाई गई. यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि जानबूझकर जोखिम को न्योता देना है. जो लोग लाइफ जैकेट पहने थे, उनके बचने की संभावना अधिक रही,यह तथ्य अपने आप में इस लापरवाही की गंभीरता को उजागर करता है.
हादसे के बाद की स्थिति भी कम शर्मनाक नहीं रही. ‘गोल्डन ऑवर’ में बचाव कार्य सबसे अहम होता है, लेकिन यहां न पर्याप्त रोशनी थी, न तत्काल संसाधन. एनडीआरएफ को बाद में बुलाना पड़ा, जिससे कीमती समय बर्बाद हुआ. क्या यह मान लिया गया था कि हादसा हो ही नहीं सकता ? अगर नहीं, तो फिर आपदा प्रबंधन की तैयारी इतनी कमजोर क्यों थी ?
सरकार ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए मुआवजे की घोषणा की और वरिष्ठ अधिकारियों को मौके पर भेजा,यह आवश्यक कदम है, लेकिन पर्याप्त नहीं. सवाल केवल राहत का नहीं, जवाबदेही का है. जब तक जिम्मेदार अधिकारियों, क्रूज ऑपरेटर और संबंधित विभागों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे हादसे दोहराए जाते रहेंगे.
यह भी जरूरी है कि इस घटना को एक ‘केस स्टडी’ की तरह लिया जाए और राज्य के सभी जल पर्यटन स्थलों पर सुरक्षा मानकों की व्यापक समीक्षा की जाए. मौसम अलर्ट को अनिवार्य रूप से लागू करने, लाइफ जैकेट की उपलब्धता और उपयोग सुनिश्चित करने, और इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम को मजबूत करने के लिए ठोस नीति बनाई जानी चाहिए. नियम केवल कागजों पर नहीं, जमीन पर दिखने चाहिए.
सबसे महत्वपूर्ण बात कि इस हादसे को भूलने की गलती नहीं की जानी चाहिए. हर बार की तरह कुछ दिनों की चर्चा और फिर चुप्पी, यह सिलसिला अब खत्म होना चाहिए. जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनके लिए न्याय केवल मुआवजा नहीं, बल्कि दोषियों की सजा है.
सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि बरगी जैसा हादसा फिर कभी न दोहराया जाए. इसके लिए कठोर कार्रवाई, पारदर्शी जांच और जवाबदेही तय करना अनिवार्य है. अगर इस बार भी जिम्मेदार बच निकले, तो यह केवल एक हादसे की विफलता नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की नैतिक हार होगी.
