दोबारा ना हो ऐसा हादसा, जिम्मेदारी तय करें

धार जिले के तिरला के पास हुआ सडक़ हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था की सामूहिक विफलता का खौफनाक आईना है. एक पिकअप वाहन में ठूंसकर भरे गए करीब 50 मजदूर, फटा हुआ टायर, और फिर एक भीषण टक्कर,16 जिंदगियां पल भर में खत्म. सवाल यह है कि क्या यह केवल ‘हादसा’ है, या एक ऐसा अपराध जिसे हम हर दिन अपनी लापरवाही से जन्म दे रहे हैं ?

सबसे पहली और सबसे बड़ी वजह है ओवरलोडिंग. पिकअप जैसे छोटे मालवाहक वाहन में 50 लोगों को भर देना, सीधे-सीधे मौत को न्योता देना है. यह कोई छुपी हुई बात नहीं है,हाईवे पर ऐसे दृश्य आम हैं. पुलिस देखती है, परिवहन विभाग जानता है, स्थानीय प्रशासन भी अनजान नहीं. फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं होती ? क्या गरीब मजदूरों की जान की कीमत इतनी कम है कि नियम सिर्फ कागजों तक सीमित रह

जाएं ? दूसरी वजह है वाहनों की तकनीकी अनदेखी.दरअसल, टायर फटना कोई अचानक आसमानी घटना नहीं होती; यह लापरवाही का परिणाम होता है. खराब या घिसे हुए टायर, नियमित जांच का अभाव,ये सब मिलकर हादसे की जमीन तैयार करते हैं. सवाल उठता है कि ऐसे वाहनों की फिटनेस जांच कितनी ईमानदारी से होती है ? या फिर यह भी एक औपचारिकता भर बनकर रह गई है ?

तीसरी और सबसे दर्दनाक सच्चाई है,खुला और असुरक्षित वाहन. पिकअप में न सीट बेल्ट, न कोई सुरक्षा ढांचा. जैसे ही टक्कर हुई, मजदूर सडक़ पर बिखर गए. कई के हाथ-पैर कट गए, कई ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. यह सिर्फ एक वाहन नहीं था, यह चलता-फिरता खतरा था, जिसे सडक़ पर चलने की इजाजत दी गई.

सरकार द्वारा मुआवजे की घोषणा संवेदनशील कदम है, लेकिन यह समाधान नहीं है. हर बार हादसे के बाद कुछ लाख रुपए देकर हम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते. असली सवाल है कि जिम्मेदार कौन ? क्या केवल ड्राइवर ? या वह ठेकेदार जिसने मजदूरों को इस तरह भरकर भेजा ? या फिर वह सिस्टम, जिसने आंखें मूंद लीं ?

जरूरत है सख्त और दिखने वाली कार्रवाई की. ओवरलोडिंग पर जीरो टॉलरेंस नीति लागू होनी चाहिए. सडक़ पर चलने वाले हर वाहन की नियमित और पारदर्शी फिटनेस जांच अनिवार्य हो. मजदूरों के परिवहन के लिए सुरक्षित साधन सुनिश्चित करना ठेकेदार और नियोक्ता की कानूनी जिम्मेदारी बनाई जाए. साथ ही, प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय हो,क्योंकि बिना उनकी चुप्पी के ऐसे हादसे संभव नहीं.

यह हादसा हमें झकझोरने के लिए काफी होना चाहिए. अगर अब भी हम नहीं चेते, तो यह सिर्फ आंकड़ों का खेल बनकर रह जाएगा, आज 16, कल शायद और ज्यादा ! सडक़ पर चलने वाला हर इंसान एक जिंदगी है, कोई आंकड़ा नहीं. अब वक्त है कि हम संवेदनाओं से आगे बढक़र सख्त फैसले लें, ताकि ‘दोबारा ना हो ऐसा हादसा’ केवल एक नारा न रह जाए, बल्कि हकीकत बन सके. ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण हादसे दोबारा ना हो, इसलिए जिम्मेदारों को जल्दी से जल्दी दंड मिलना जरूरी है.

 

 

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