वैश्विक ऊर्जा राजनीति में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के ताजा फैसले ने एक बड़ा मोड़ ला दिया है. ओपेक और ओपेक प्लस से बाहर निकलने की उसकी ऐतिहासिक घोषणा केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि तेल अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक संतुलन में दूरगामी प्रभाव डालने वाला कदम है. 1 मई 2026 से प्रभावी होने जा रहा यह निर्णय उस समय आया है जब दुनिया पहले से ही ऊर्जा असुरक्षा और क्षेत्रीय तनावों के दबाव में है.
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है,
होर्मूज जल डमरूमध्य का विकल्प. यह संकीर्ण समुद्री मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है, जहां से लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है. लेकिन ईरान और पश्चिम के बीच बढ़ते तनाव ने इसे एक स्थाई जोखिम क्षेत्र बना दिया है. ऐसे में यूएई का ओपेक से बाहर आना उसे उत्पादन और निर्यात के मामलों में अधिक स्वतंत्रता देता है, जिससे वह अपनी ऊर्जा आपूर्ति को होर्मूज जैसे संवेदनशील मार्गों पर निर्भर रहने के बजाय वैकल्पिक रास्तों से संचालित कर सके.
दरअसल, यूएई इस दिशा में पहले ही ठोस कदम उठा चुका है. अबू धाबी से फुजैरा तक बनी पाइपलाइन उसे सीधे अरब सागर तक पहुंच प्रदान करती है, जिससे होर्मूज को बायपास करना संभव हो जाता है. ओपेक के कोटा प्रतिबंधों से मुक्त होकर यूएई अब अपनी पूरी उत्पादन क्षमता का उपयोग कर सकता है और इन वैकल्पिक मार्गों को अधिक प्रभावी बना सकता है.
यह फैसला ओपेक के लिए भी कम झटका नहीं है. सऊदी अरब और इराक के बाद तीसरे सबसे बड़े उत्पादक का संगठन से बाहर होना उसके सामूहिक प्रभाव को कमजोर कर सकता है. अब तक ओपेक वैश्विक तेल कीमतों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है, लेकिन यूएई के इस कदम से ‘कार्टेल नियंत्रण’ की अवधारणा पर सवाल खड़े होंगे. खासकर तब, जब सदस्य देशों के बीच उत्पादन नीति को लेकर मतभेद पहले से मौजूद हैं.
भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों के लिए यह घटनाक्रम अच्छे संकेत लेकर आया है. यानी यूएई के साथ द्विपक्षीय और लचीले समझौते आसान हो सकते हैं, जिससे ऊर्जा आपूर्ति के नए विकल्प खुलेंगे. जाहिर है भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति में विविधता और सुरक्षा लाने के संदर्भ में इसका लाभ ही होगा. इसके अलावा तेल की कीमतों पर भी इस फैसले का असर पड़ेगा. यदि यूएई अपनी अधिकतम उत्पादन क्षमता के साथ बाजार में उतरता है, तो आपूर्ति बढऩे से कीमतों में नरमी आ सकती है. हालांकि, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि अन्य प्रमुख उत्पादक देश, विशेषकर सऊदी अरब, किस प्रकार की रणनीति अपनाते हैं. कुल मिलाकर यूएई का यह निर्णय केवल एक देश की नीति नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था का संकेत है. दुनिया अब एकल निर्भरता वाले मार्गों से हटकर बहु-विकल्पीय और सुरक्षित आपूर्ति तंत्र की ओर बढ़ रही है. ऐसे में होर्मूज का विकल्प केवल एक रणनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा का अनिवार्य आधार बनता जा रहा है.
