इंदौर: प्रदेश सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए प्रदेश के सभी नगर निगमों में महापौर निधि का प्रावधान खत्म कर दिया है. उक्त महापौर निधि को खत्म करने के लिए नगर पालिका अधिनियम 1956 और 2018 का हवाला देकर बताया है कि ऐसा बजट में प्रावधान करने नियम ही नहीं है. राज्य सरकार ने सभी नगर पालिकाओं को आगामी वित्तीय वर्ष 2026-27 में महापौर निधि की राशि नहीं रखने का पत्र जारी किया है.
राज्य सरकार के नगरीय प्रशासन विभाग उप सचिव प्रमोद कुमार शुक्ला ने नगर निगमों में बजट में महापौर निधि का प्रावधान नही करने का पत्र जारी कर भाजपा और राजनीतिक क्षेत्रों में भूचाल ला दिया है. उप सचिव शुक्ला ने नगर पालिका अधिनियम 1956 के अध्याय 7 और नगर पालिका विधान 2018 का हवाला देते हुए प्रदेश की सभा नगर निगम और नगर पालिकाओं को निर्देश दिए हैं कि आगामी 2026-27 के बजट में महापौर निधि की राशि का अलग से प्रावधान नहीं किया जाए. उपसचिव के उक्त पत्र से प्रदेश के खासकर भाजपा शासित नगर निगमों में भारी हड़कंप मच गया है. हड़कंप इसलिए मच गया है कि करीब सवा साल बाद नगद निगम के चुनाव है और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस उक्त मामले को मुद्दा बना कर भाजपा के खिलाफ प्रचार करेगी.
अत्यावश्यक कार्यों के लिए करते थे उपयोग
ध्यान रहे कि इंदौर नगर निगम में पिछले साल बजट में 10 करोड़ रुपए महापौर निधि का प्रावधान किया गया था. उक्त महापौर निधि का उपयोग महापौर अपने स्वविवेक से अत्यावश्यक कार्यों को तुरंत करवाने के लिए उपयोग करते थे. अब यह व्यवस्था पूरे प्रदेश में बंद करने के आदेश जारी हो गए है. इससे इंदौर ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में आम जनता की समस्याओं का तुरंत राहत और निदान नहीं होगा. साथ ही ऐसा माना जा रहा है कि महापौर अपने खास क्षेत्र और लोगों के काम स्वनिधि से करने की कोशिश करते थे, उस व्यवस्था पर सीधे रोक लगाई गई है.
राज्य शासन ने आया पत्र
इस बारे में नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल ने पुष्टि करते हुए कहा कि राज्य शासन से पत्र आया है और पत्र पूरे प्रदेश के लिए जारी हुआ है. आप पत्र पढ़कर आदेश को समझ सकते है.
