लोटस इंफ्रारिएल्टी लिमिटेड के डायरेक्टर ने करोड़ों लेकर बंद कर दिया शॉपिंग काम्पलेक्स का निर्माण

सतना: लोटस इंफ्रारिएल्टी लिमिटेड के डायरेक्टर नीरज चौरसिया ने कोवेन्ट कोर्ट कॉम्पलेक्स नाम से निमार्णाधीन शॉपिंग काम्पलेक्स दिखाकर कॉम्पलेक्स की लगभग सभी दुकानें ग्राहकों को बिक्रय कर करोड़ों की राशि लेने के बाद शॉपिंग मॉल का निर्माण कार्य बंद कर दिया। इसी निमार्णाधीन कॉम्पलेक्स की दूसरी मंजिल में निर्मित होने वाली दुकान नंम्बर एसएस-एस5 जिसकी बेसिक कीमत 17 लाख 90 हजार रुपए है, को 23 नवंबर 2015 को 51 हजार रुपए देकर विराट नगर निवासी हिमांशु गर्ग ने भी बुक किया था। जिसके एवज में हिमांशु गर्ग ने 10 लाख 51 हजार का भुगतान कर दिया। कॉम्पलेक्स का निर्माण कार्य बन्द हो जाने पर हिमांशु गर्ग ने शेष राशि का भुगतान नहीं किया और बिल्डर से अपनी जमा राशि की मांग की।

डायरेक्टर नीरज चौरसिया ने ना तो निर्माण कार्य प्रारम्भ किया और ना ही हिमांशु गर्ग की जमा रकम ही लौटाई। जिससे परेशान होकर हिमांशु ने अपने अधिवक्ता अजय सिंह रघुवंशी के माध्यम से एमपी रियल स्टेट रेगुलेटरी एथॉर्टी, रेरा भवन, भोपाल के समक्ष ब्याज सहित रकम वापसी एवं बिल्डर के विरूद्ध कार्यवाही किए जाने की शिकायत प्रस्तुत की। सुनवाई करते हुए न्यायनिर्णायक अधिकारी मध्य प्रदेश भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण भोपाल ने लोटस के डायरेक्टर के विरूद्ध आदेश पारित करते हुए हिमांशु गर्ग द्वारा जमा राशि 10 लाख 51 हजार रुपए 16 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से लौटाए जाने का आदेश दिया।

साथ ही शारीरिक कष्ट की क्षतिपूर्ति के मद में 1 लाख रुपए प्रकरण व्यय के रूप में 21 हजार 7 सौ 35 रुपए एवं अन्य खर्च के रूप में 10 हजार रुपए भी दो माह के अंदर हिमांशु गर्ग को दिए जाने का आदेश पारित गया था। जिसकी ब्याज सहित कुल राशि 29 लाख 18 हजार 7 सौ रुपए की वसूली के लिए 16 अप्रैल 2021 को रेरा ने सतना कलेक्टर को निर्देशित करते हुए पत्र जारी किया था कि लोटस इंफ्रारिएल्टी लिमिटेड के डायरेक्टर नीरज चौरसिया की जंगम या स्थावर संपत्ति या दोनों को कुर्क कर 29 लाख 18 हजार 7 सौ रुपए की वसूली सुनिश्चित करें।

ना कुर्की हुई, ना ही वसूली राशि
सतना कलेक्टर द्वारा बिल्डर के विरूद्ध वसूली संबंधित कोई कार्यवाही नहीं की गई। जिससे व्यथित होकर आवेदक ने अपने अधिवक्ता के माध्यम उच्च न्यायालय जबलपुर के समक्ष याचिका संख्या डब्ल्यूपी/2946/2026 संस्थित की। जिसकी सुनवाई करते हुए 9 फरवरी 2026 को उच्च न्यायालय ने सतना कलेक्टर को 6 माह के अंदर वसूली कार्यवाही पूर्ण करने का निर्देश दिया है। उच्च न्यायालय द्वारा पारति उक्त आदेश की कापी भी कलेक्टर सतना को प्राप्त हो चुकी है, बावजूद इसके अब तक इस संबंध में कोई कार्यवाही नहीं की गई।

रेरा को खत्म कर देना चाहिए
अधिवक्ता अजय सिंह रघुवंशी ने बताया कि निवेशकों के साथ की जाने वाली अनियमितता को रोकेने एवं बिल्डरों के मकान निर्माण के कार्यों की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा यह एक्ट लाया गया जो लगभग सभी राज्यों में लागू है। सीमित अधिकार होने के कारण रेरा प्रभावशाली तरीके से कार्य नहीं कर रहा है। रेरा का गठन बिल्डरों के मनमाने रवैये पर लगाम लगाने के उद्देश्य से किया गया था, किन्तु रेरा को सीमित अधिकार दिए गए हैं। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी रिएल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह संस्था अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुई है। रेरा पीडि़तों के बजाय बिल्डरों की मदद कर रही है। जिन लोगों के लिए रेरा बनाया गया है वे लोग पूरी तरह निराश व हताश हैं। पिछले आठ वर्षों में मध्य प्रदेश रेरा ने बिल्डरों के खिलाफ 2382 मामलों में 374 करोड़ की राजस्व वसूली प्रमाण पत्र जारी किए हैं, जिसमें से मात्र 10 करोड़ की ही वसूली आज तक हो पायी है। बिल्डरों की अनियमिताओं, मनमानें तरीके से घटिया निर्माण कार्य, मूलभूत सुविधाएं एवं ग्राहकों की क्षतिपूर्ति और प्रोजेक्ट पंजीयन से जुड़े 200 से 250 मामले प्रतिमाह रेरा में दर्ज होते हैं। बिल्डरों के ऊपर रेरा को कोई नियंतत्र नहीं रह गया है, बिल्डर आज भी रेरा से डिफाल्टर होते हुए भी ग्राहकों के साथ धोखा करते हुए अपना निर्माण कार्य जारी रखे हैं, ऐसे में सरकार को चाहिए कि रेरा को खत्म कर देना चाहिए।

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