नयी दिल्ली, 02 मार्च (वार्ता) उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा है कि विविधता के बावजूद भारत एक ही धर्म से सांस्कृतिक रूप से एकजुट है और भाषायी विविधताओं की भूमि के बावजूद भारत की आत्मा एक है।
श्री राधाकृष्णन ने सोमवार को उपराष्ट्रपति भवन में प्रख्यात तमिल विद्वानों, विरासत, वास्तुकला, साहित्य, संस्कृति और सभ्यतागत विचारों पर आधारित 16 पुस्तकों के विमोचन समारोह को संबोधित करते हुए यह बात कही। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत प्रकाशन विभाग ने इन पुस्तकों को प्रकाशित किया है।
उपराष्ट्रपति ने इस मौके पर कहा कि उन्होंने जिन पुस्तकों का विमोचन किया है उनमें तमिल सभ्यता की गहराई और विविधता को दर्शाया गया है। इनमें मंदिर परंपराएं, दर्शन, वास्तुकला, साहित्य, संगीत, विज्ञान, सामाजिक सुधार और आध्यात्मिक विचारों को बारीकी से पिरोया गया है।
श्री राधाकृष्णन ने इस दौरान वंदे मातरम के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी पर तमिल, अंग्रेजी और हिंदी में प्रकाशित पुस्तकों का भी विमोचन किया। अमर गीत वंदे मातरम को याद करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस गीत ने लाखों लोगों के दिलों में क्रांति की भावना जगाई और अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरित किया। उन्होंने पुस्तक के प्रकाशन के लिए प्रकाशन विभाग की सराहना करते हुए कहा, ‘उन दो शब्दों में हमारी मिट्टी की सुगंध, हमारी नदियों की शक्ति और हमारी मातृभूमि की भावना समाहित है।’
उपराष्ट्रपति ने तमिल को दुनिया की सबसे प्राचीन शास्त्रीय भाषाओं में एक बताते हुए कहा कि दो सहस्राब्दियों से अधिक की साहित्यिक और दार्शनिक परंपरा वाली तमिल को विश्व की सबसे प्राचीन शास्त्रीय भाषाओं में से एक बताते हुए कहा कि आज जिन पुस्तकों का उन्होंने विमोचन किया है वे सभी पुस्तकें तमिल ज्ञान प्रणालियों की बौद्धिक गहराई और सभ्यतागत निरंतरता को दर्शाती हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय मंदिर केवल पूजा स्थल ही नहीं, बल्कि कला, वास्तुकला, संगीत, खगोल विज्ञान, गणित और सामाजिक संगठन के केंद्र भी हैं। हमारे पूर्वजों ने दर्शन, साहित्य, विज्ञान और सामाजिक सुधार में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।
श्री राधाकृष्णन ने कहा कि भारत अनेक भाषाओं की भूमि है, लेकिन इसकी सभ्यतागत आत्मा एक ही है। उन्होंने कहा कि भाषा, धर्म और राजनीतिक विचारधाराओं में भिन्नता के बावजूद, भारत हमेशा से एक देश रहा है, जो एक ही धर्म से सांस्कृतिक रूप से एकजुट है। उन्होंने आगे कहा कि वसुधैव कुटुंबकम और ‘याधुम ऊरे यावरुम केलिर’ के आदर्श इसी धर्म को प्रतिबिंबित करते हैं।
देश के हर गाँव में रामायण और महाभारत के सहज प्रसार पर उन्होंने कहा कि ये महाकाव्य थोपे नहीं गए बल्कि उस साझा आध्यात्मिक भावना के माध्यम से अपनाए गए हैं जो राष्ट्र को एक साथ बांधती है। उन्होंने 2047 तक विकसित भारत के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सांस्कृतिक संरक्षण भी होना चाहिए। उन्होंने वैश्विक मंचों पर तिरुक्कुरल और सुब्रमण्यम भारती का बार-बार उल्लेख करने सहित, तमिल विरासत को सम्मानित करने के लिए प्रधानमंत्री के निरंतर प्रयासों की सराहना की और कहा कि श्री मोदी जहाँ भी गए हैं उन्होंने वहाँ तमिल भाषा की महानता को लगातार पहचाना और सराहा है।
