छात्र राजनीति से देश के सर्वोच्च नेता तक, ऐसा रहा ख़ामेनेई का जीवन

तेहरान, 01 मार्च (वार्ता) अमेरिका-इज़रायल के संयुक्त हमलों में शनिवार तड़के मारे गये ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई चार दशकों से अधिक समय से ईरान की राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक दिशा तय करते रहे। उनके नेतृत्व ने ईरान की आंतरिक सत्ता संरचना और वैश्विक मंच पर उसकी स्थिति दोनों को गहराई से प्रभावित किया है। श्री ख़ामेनेई राजधानी तेहरान में अपने कार्यालय में थे तभी राजधानी की ओर दागी गयी कई मिसाइलों में से एक उस इमारत पर आ गिरी। श्री ख़ामेनेई के बाद एक ओर जहां ईरान नये सर्वोच्च नेता के नाम पर विचार कर रहा है, वहीं इजरायल और अमेरिका ईरान के लोगों से अनुरोध कर रहे हैं कि उन्हें इस मौके का फायदा उठाकर इस्लामी गणराज्य के शासन को खत्म कर देना चाहिए। इजरायल और अमेरिका का श्री खामेनेई की मृत्यु को बड़ी सफलता मानना इस बात का सूचक है कि वह ईरान की स्थिरता के लिए कितने अहम थे। श्री ख़ामेनेई का जन्म 19 अप्रैल 1939 को ईरान के मशहद में एक धार्मिक परिवार में हुआ। उनके पिता सैयद जवाद ख़ामेनेई एक सम्मानित शिया धर्मगुरु थे। परिवार आर्थिक रूप से साधारण था, लेकिन धार्मिक और बौद्धिक माहौल के कारण श्री खामेनेई का झुकाव इस ओर रहा। मशहद में प्रारंभिक धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद श्री खामेनेई क़ुम और नजफ़ गए, जहां उन्होंने इस्लामी न्यायशास्त्र (फिक़्ह), तफ़सीर, दर्शन और हदीस का अध्ययन किया। दस्तावेज़ बताते हैं कि उन पर विशेष रूप से अयातुल्ला रुहुल्ला ख़ुमैनी का प्रभाव पड़ा। उस समय ईरान में शाहों का शासन चलता था। वह खुमैनी से प्रभावित होकर 1960 के दशक में शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासन के विरोध में सक्रिय हो गये।

उन्होंने 1963 के बाद खुलकर क्रांतिकारी भाषण देने शुरू किये। उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और यातनाएं भी झेलनी पड़ीं। शाह के खिलाफ विरोध में आगे रहने के कारण श्री खामेनेई 1970 के दशक में क्रांतिकारी नेटवर्क के प्रमुख धार्मिक चेहरों में शामिल हो चुके थे। आखिर जब 1979 में ईरान में इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई तब वह राष्ट्रीय नेतृत्व का हिस्सा बन गये। उन्होंने 1979-81 के बीच इस्लामी क्रांति परिषद और रक्षा मामलों से जुड़े पदों पर सक्रिय भूमिका निभाई। वह 1980 में तेहरान के इमाम जुमा (शुक्रवार नमाज़ के प्रमुख) नियुक्त हुए। श्री खामेनेई 1981 में ईरान के राष्ट्रपति चुने गये। सन् 1985 के चुनावों में उन्हें फिर से इस पद पर चुना गया। बतौर राष्ट्रपति उनका कार्यकाल ईरान–इराक युद्ध (1980–88) के दौर से जुड़ा रहा। इस अवधि में उन्होंने प्रशासनिक पुनर्गठन और युद्धकालीन राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने में भूमिका निभाई। अयातुल्ला रुहोल्लाह ख़ुमैनी के निधन के बाद विशेषज्ञों की सभा ने जून 1989 में श्री ख़ामेनेई को ईरान का सर्वोच्च नेता चुना। उस समय वह धार्मिक पदक्रम में सर्वोच्च स्तर (मरजा) पर नहीं थे, लेकिन राजनीतिक अनुभव और क्रांतिकारी पृष्ठभूमि के कारण उन्हें चुना गया। सर्वोच्च नेता के पद पर रहते हुए उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती इजरायल और अमेरिका थे। उन्होंने ईरान की रक्षा पर ध्यान केन्द्रित करते हुए बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम का विस्तार किया और ड्रोन एवं क्रूज़ मिसाइल क्षमता बढ़ाई। इसके साथ ही श्री खामेनेई ने लेबनान, इराक, सीरिया और यमन में एक क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क तैयार किया।

ईरान भले ही हमेशा शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु हथियार बनाने की बात करता रहा है, लेकिन श्री ख़ामेनेई ने कई बार कहा कि परमाणु हथियार “इस्लाम के विरुद्ध” हैं। उन्होंने एक फतवा जारी किया जिसमें परमाणु हथियारों को हराम बताया गया। उनके कार्यकाल में हालांकि ईरान की यूरेनियम संवर्धन क्षमता लगातार बढ़ी और फोर्डाे और नतांज़ जैसे भूमिगत परमाणु ठिकाने तैयार हुए। चार दशकों से अधिक समय से जारी उनकी भूमिका ने ईरान की आंतरिक सत्ता संरचना और वैश्विक मंच पर उसकी अलग पहचान बनायी थी लेकिन अब उनके मारे जाने से देश पर शंका के बादल छा गये हैं।

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