एमपी कांग्रेस को शिल्पकार की दरकार

दिलीप झा

एमपी कांग्रेस को शिल्पकार की दरकार

मध्यप्रदेश कांग्रेस की राजनीति में भीषण उथल पुथल चल रहा है। गुटबाजी को संभालना किसी वरिष्ठ नेता के लिए मुश्किल ही नहीं कठिन है। कहा जाता है कि राजनीति में अक्सर सेहरा उनके सिर बंधता है जो अंत में कमान संभालते हैं, लेकिन जीत की असल इबारत वो लिखते हैं जो कठिन समय में संगठन की जमीन तैयार करते हैं। कांग्रेस सूत्र बताते हैं कि मध्य प्रदेश कांग्रेस के संदर्भ में यह विश्लेषण पूरी तरह सटीक है कि 2018 में जो कमलनाथ की सरकार बनी थी, वह वास्तव में अरुण यादव के साढ़े चार साल के अथक परिश्रम और संघर्ष का परिणाम थी। ​यह एक राजनीतिक तथ्य है कि जब कांग्रेस प्रदेश में हाशिए पर थी अर्थात सुखाड़ के हालात बने हुए थे तब अरुण यादव ने प्रदेश अध्यक्ष के रूप में संगठन की कमान संभाली। उन्होंने साढ़े चार साल तक पूरे प्रदेश के संपूर्ण जिलों (50+) की धूल छानी और ऐतिहासिक पदयात्राएं कीं। उन्हीं के कार्यकाल में कार्यकर्ता सड़कों पर उतरा और भाजपा के खिलाफ माहौल बना। 2018 की जीत उसी साढ़े चार साल की तपस्या का फल थी, जिसका लाभ पार्टी को मिला।
​​अरुण यादव के पास स्वर्गीय सुभाष यादव की वह विरासत है जिसने मध्य प्रदेश में ‘सहकारिता आंदोलन’ खड़ा किया। सहकारिता के माध्यम से उनका जुड़ाव केवल पिछड़ा वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्राह्मण, क्षत्रिय (ठाकुर), लोधी और खाती समाज सहित हर वर्ग के किसान परिवारों के साथ उनका सीधा और पारिवारिक रिश्ता है। राजनीति को करीब से समझने वालों का कहना है कि यह वह सामाजिक पूंजी है जो 2028 और 2029 में कांग्रेस की नैया पार लगा सकती है।
कांग्रेस के जमीन से जुड़े नेताओं का कहना है कि ​​अरुण यादव का प्रभाव किसी एक क्षेत्र की भौगोलिक सीमाओं में कैद नहीं है। मालवा और निमाड़ से लेकर विंध्य क्षेत्र, बुंदेलखंड और ग्वालियर-चंबल (विशेषकर भिंड) तक, उनकी स्वीकार्यता एक ‘मास लीडर’ के रूप में है। वे सही मायनों में ‘अखिल मध्य प्रदेश’ के चेहरे हैं।
​अगर हम 2018 और 2019 के चुनावों के सूक्ष्म विश्लेषण को देखें, तो यह स्पष्ट है कि कांग्रेस को सबसे अधिक लाभ उन्हीं वर्गों और क्षेत्रों से मिला जहां अरुण यादव का प्रभाव सक्रिय था। आगामी 2028 की विधानसभा और 2029 की लोकसभा की बड़ी लड़ाई जीतने के लिए कांग्रेस को उनके अनुभव, बेदाग छवि और सांगठनिक पकड़ की सख्त जरूरत है। भाजपा के ‘यादव कार्ड’ और उनकी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ को ध्वस्त करने की क्षमता केवल अरुण में है।
​​दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज के बाद, राज्यसभा में एक ऐसे नेता की आवश्यकता है जो सदन में दहाड़ सके और जमीन पर कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा सके। पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद के रूप में अरुण यादव का अनुभव राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को मजबूती देता है। मध्य प्रदेश की जनता और कांग्रेस पार्टी के लिए वर्तमान में उनसे श्रेष्ठ और कोई विकल्प नहीं है। वर्तमान में जरूरत इस बात की है कि लोकसभा में कांग्रेस के प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी मध्य प्रदेश की सामाजिक समरसता भाव रखने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की पुकार को सुनें। कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता बताते हैं कि अरुण यादव को राज्यसभा भेजना केवल एक नियुक्ति नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता में वापसी का ‘शंखनाद’ होगा। मध्य प्रदेश के कांग्रेस कार्यकर्ताओं और पार्टी के भविष्य के लिए इससे अधिक उपयुक्त विकल्प और कोई नहीं है।

कांग्रेस संगठन का किला अंदर से खोखला

राजनीति के कुरुक्षेत्र में राहुल गांधी अकेले लड़ रहे हैं, क्योंकि उनके पीछे खड़ा संगठन का किला अंदर से खोखला हो चुका है। कांग्रेस कार्यालयों में राजनीतिक नियुक्तियों ने संगठन का बेड़ा गर्क कर दिया है। सिर्फ मेरा आदमी और तेरा आदमी अब वक्त आ गया है कि इन दफ्तरों से ‘राजनीतिक चश्मे’ वाले कर्मचारियों को बाहर किया जाए और प्रबंधन की कमान भारतीय सेना के सेवानिवृत्त अधिकारियों को सौंपी जाए।‌ ​एक राजनैतिक कार्यकर्ता या नेता जब दफ्तर की जिम्मेदारी संभालता है, तो वह ‘गुटबाजी’ और ‘पहुंच’ देखता है। लेकिन एक रिटायर्ड फौजी केवल अनुशासन और समयबद्धता देखता है।आज कांग्रेस दफ्तर का हाल यह है कि कार्यकर्ता के पत्र की 4 साल तक पावती नहीं मिलती। देश का राष्ट्रपति भवन 50 पन्नों का जवाब एक महीने में दे देता है, लेकिन कांग्रेस का स्टाफ ‘पाषाण युग’ की नींद सो रहा है। इसलिए ​अगर पीसीसी में एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी बैठा होगा, तो वह सुनिश्चित करेगा कि हर कॉल का ‘कॉल बैक’ हो और हर पत्र का जवाब समय सीमा के भीतर मिले, जैसा कि भाजपा के गृहमंत्री के दफ्तर में होता है। ​आज की आधुनिक संचार नीति के दौर में भी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि ‘भीतरघात’ है। कुछ कांग्रेसी दावे के साथ कहते हैं कि कांग्रेस के दफ्तरों में बैठे कई कर्मचारी भाजपा के ‘स्लीपर सेल’ की तरह काम कर रहे हैं। वे जानबूझकर कार्यकर्ता को अपमानित करते हैं ताकि वह पार्टी छोड़ दे। ​मध्य प्रदेश में गुटबाजी इस कदर हावी है कि कोई गुट किसी की नहीं सुन रहा है।‌ सूत्र बताते हैं कि कमलनाथ के दौर में अनुशासन था क्योंकि वे प्रतिदिन अपडेट लेते थे, लेकिन आज का नेतृत्व केवल ‘स्वागत अभियानों’ की मालाओं में दबा हुआ है।इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ​ राजीव गांधी और मनमोहन सिंह के समय संगठन में जो कसावट थी, वह मिलिट्री स्तर के अनुशासन से ही आई थी। आज कांग्रेस के उत्थान के लिए यह अनिवार्य है। जो 4 साल से जवाब नहीं दे पाए, उन ‘जयचंदों’ को तत्काल बर्खास्त किया जाए।
एक प्रोफेशनल कॉल सेंटर और तकनीकी प्रणाली विकसित की जाए जो सीधे आलाकमान को रिपोर्ट करे।
​कार्यकर्ता को ‘नेताओं के दर्शन’ नहीं, अपनी समस्या का ‘समाधान’ चाहिए। जब तक कांग्रेस के दफ्तरों में राष्ट्रपति भवन जैसा अनुशासन और सैन्य स्तर की जवाबदेही नहीं आएगी, तब तक संगठन का पुनरुद्धार असंभव है। राहुल गांधी दफ्तरों में बैठे इन ‘राजनीतिक दीमकों’ को हटाइए और ‘अनुशासन का अनुशासन’ लागू कीजिए।नियम कानून और कायदे की बात कांग्रेस से दूर होती चली गई और यही वजह है कि जमीन जुड़े कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस से दूरियां बना ली है। यह निर्विवाद है कि प्रदेश कांग्रेस में जान फूंकने के लिए एक ऐसे व्यक्तित्व की दरकार है जिसकी पूरे प्रदेश में स्वीकार्यता हो और दूरदर्शी सोच के साथ लोगों को जोड़ने में उसे महारत हासिल हो।

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