महाकौशल की डायरी
अविनाश दीक्षित
एक ओर कांग्रेस निचले स्तर तक मजबूत होने के लिए तरह-तरह के कार्यक्रम बना रही है तो दूसरी ओर महाकौशल के एपिक सेंटर जबलपुर में पार्टी के नेता और जनप्रतिनिधि बिना कमांडर की फौज की तरह व्यवहार कर रहे हैं। पिछले दिनों जबलपुर नगर निगम के सदन में कांग्रेस के एक पार्षद ने जिस तरह भाजपा नेता के कसीदे पढ़े, उससे ध्वनित हुआ कि स्थानीय कांग्रेसियों पर अब किसी का नियंत्रण नहीं रह गया है। कहने को तो पार्टी के पास सौरभ नाटी शर्मा जिला कमेटी अध्यक्ष और नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष के रूप में अमरीश मिश्रा जैसे जमीनी पदाधिकारी विद्यमान हैं मगर इनकी कोई सुन रहा है ऐसा नजर नहीं आ रहा है।
दरअसल 28 अप्रैल को जबलपुर नगर निगम सदन में कांग्रेस पार्षद अनुपम जैन ने मध्यप्रदेश के लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह और भाजपा के कार्यों की खुलकर तारीफों के पुल बांधे। उन्होंने कहा कि शहर में मंत्री द्वारा जो कार्य कराए जा रहे हैं वह तो सभी को दिखाई दे रहे हैं परंतु महापौर का ऐसा कोई भी महत्वपूर्ण कार्य अभी तक सामने नहीं आया है जो शहर विकास के नजरिए से फायदेमंद हो। कांग्रेस पार्षद की पीडब्ल्यूडी मंत्री की तारीफ करना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन बड़ा सवाल यह है कि विपक्ष में बैठकर सत्ता पक्ष की नीतियों, कार्य और कमजोरियों पर प्रहार न करके पार्षद ने क्या पार्टी लाइन क्रॉस नहीं की है…?
बहरहाल कांग्रेस पार्षद ने जो व्यवहार किया उसके निहितार्थ वही जानते होंगे लेकिन उन्होंने स्थानीय संगठन के नेतृत्व पर भी सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस के ही हल्कों में तरह-तरह की चर्चाएं चल रहीं हैं। पार्षद दल के कुछ सदस्यों का कहना है कि आपसी मतभेद समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है, समन्वय के अभाव में कोई रणनीति तक नहीं बन पा रही है। आलम यह है कि सदन की बैठक में सत्तापक्ष को जोरदार तरीके से घेरने की जगह महज रस्मी आरोप लगाए जा रहे हैं जिसका फायदा सत्तापक्ष ले रहा है।
संगठन पर सवाल
कांग्रेस पार्षद अनुपम जैन ने नगर निगम सदन में जो बातें कहीं उस पर कायदे से कांग्रेस संगठन द्वारा नोटिस देकर जवाब तलब किया जाना चाहिए था परंतु अभी तक ऐसा कुछ होता नहीं दिखा है। नगर निगम में दो-तीन बार पार्षद रहे अनुभवी पूर्व पार्षदों का मानना है कि पार्षद अनुपम जैन के प्रति संगठन की ढिलाई से दूसरे कार्यकर्ताओं और पार्षदों के हौंसलें बुलंद हो सकते हैं जो पार्टी हित में नहीं रहेगा।
हाशिए पर परंपरा
पूर्व पार्षदों के मुताबिक नगर निगम सदन में बैठक होने के पहले कांग्रेस पार्षद दल की अलग बैठक हुआ करती थी, एजेंडा तय किया जाता था। नगर अध्यक्ष, नगर निगम नेता प्रतिपक्ष सहित पूर्व अनुभवी पार्षद सहित वर्तमान पार्षद बातचीत कर रणनीति तय कर सदन में मौजूदा पार्षदों को उनकी भूमिकाएं बताईं जातीं थीं मगर यह परंपरा अब नजर ही नहीं आती। अब न संगठन पार्षद दल से समन्वय स्थापित करते दिखता है और न ही पार्षद दल स्थानीय संगठन को तवज्जो देता प्रतीत होता है।
और कब तक इंतजार
शहडोल भाजपा मेें गुटबाजी चरम पर है, जिसके चलते 5 माह बाद भी पार्टी कुछ मंडलों में अध्यक्ष नहीं बना पाई है। इसके पीछे की वजह माननीयों की अड़ंगेबाजी मानी जा रही है। स्मरण रहे कि कमलदल के जिलाध्यक्ष का चयन काफी जद्दोजहद के बाद हो पाया था। अब ब्यौहारी, सोहागपुर और बुढ़ार जैसे मंडल महीनों से अध्यक्ष विहीन चल रहे हैं। चर्चा है कि चहेतों को पद दिलाने के चक्कर में माननीयों के बीच पटरी नहीं बैठ पा रही है। भाजपाई गलियारों में शिकवा शिकायतों का दौर अभी थमा नहीं है। पिछले दिनों धनपुरी मंडल अध्यक्ष का निष्काषन इसी का परिणाम माना जा रहा है। फिलहाल उपरोक्त मंडलों के अध्यक्ष को लेकर रस्साकशी चल रही है और भाजपा कार्यकर्ता निर्णय न होने की वजह से मायूस नजर आ रहे हैं।
