
खंडवा। खंडवा के विकास के माथे पर तीन पुलिया रेलवे ओवरब्रिज अब एक कलंक बनता जा रहा है। 2017 में जब इस प्रोजेक्ट का भूमिपूजन हुआ था, तब नेताओं के चेहरों पर चमक और वादों में खनक थी। दावा था कि 2 साल में पुल बनकर तैयार होगा और जनता को राहत मिलेगी। आज कैलेंडर 2026 दिखा रहा है, लेकिन धरातल पर काम आज भी राम भरोसे है।
बीते 8 सालों में अगर कुछ बढ़ा है, तो वह है प्रोजेक्ट की लागत और जनता की मुसीबतें। खंडवा की जनता अब यह सोचने पर मजबूर है कि क्या उनका शहर प्रशासन और नेताओं के लिए महज एक एक्सपेरिमेंट लैब बनकर रह गया है?
हादसा या हत्या की साजिश?
23 जनवरी 2026 के आसपास हुए रूह कंपा देने वाले हादसे ने प्रशासन की जानलेवा लापरवाही की पोल खोलकर रख दी। निर्माणाधीन पुल पर सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं थे—न बैरिकेड्स, न रेडियम, न कोई गार्ड। नतीजतन, अंधेरे में दो बाइक सवार 40 फीट नीचे गिर गए। जिस ठेकेदार को साइड पर सुरक्षा सुनिश्चित करनी थी, वह नदारद था। जिस क्कङ्खष्ठ और सेतु निगम को मॉनिटरिंग करनी थी, उनकी आँखों पर पट्टी बंधी थी।
यह प्रोजेक्ट रेलवे क्रॉसिंग के ऊपर बन रहा है, इसलिए इसकी तकनीकी मंजूरी और गर्डर लॉन्चिंग का जिम्मा रेलवे के पास है।
कहाँ है दिशा’? सांसद महोदय जिले की दिशा कमिटी के अध्यक्ष हैं। 8 सालों में दर्जनों बैठकें हुईं, तो क्या कभी अधिकारियों से यह पूछा गया कि रेलवे की ड्राइंग 8 साल तक क्यों अटकी रही?
जनता के प्रति जवाबदेही: जनता ने जनप्रतिनिधियो को दिल्ली में अपनी आवाज बनाने के लिए चुना था, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वे केवल कोरे आश्वासन देने तक ही सीमित रह गए।
सिस्टम फेल: लेटलतीफी की कीमत कौन चुकाएगा?रेलवे द्वारा ड्राइंग और ब्लॉक परमिशन में देरी को ढाल बनाकर अधिकारी अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। लेकिन इस देरी के कारण जो 24 करोड़ रुपये लागत वृद्धि के रूप में चूना सरकारी खजाने को लगा है, उसकी भरपाई किसकी जेब से होगी? खंडवा अब और इंतजार नहीं कर सकता। यह समय है कि प्रशासन तारीख पर तारीख देना बंद करे और यह श्वेत पत्र जारी करे कि आखिर यह पुल कब पूरा होगा?
बहरहाल तीन पुलिया आरओबी महज ईंट-गारे का ढांचा नहीं, बल्कि खंडवा की जनता के धैर्य की परीक्षा बन चुका है। अगर जल्द ही ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह अधूरा पुल प्रशासन की नाकामी का सबसे बड़ा स्मारक बनकर खड़ा रहेगा।
