गाजियाबाद के लोनी इलाके में भारत सिटी सोसायटी से सामने आई तीन सगी बहनों की सामूहिक आत्महत्या की घटना केवल एक आपराधिक या पारिवारिक त्रासदी नहीं है, बल्कि यह हमारे समय के सबसे खतरनाक सामाजिक संकट की चेतावनी है.हाल ही में घटी यह घटना देश के हर माता-पिता, शिक्षक और नीति-निर्माता को झकझोरने वाली है. यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता कि क्या हम अपने बच्चों को स्मार्टफोन के हाथों खोते जा रहे हैं.टनिशिका, प्राची और पाखी. तीन नाम, तीन मासूम चेहरे और एक जैसी नियति. पुलिस की प्रारंभिक जांच में सामने आया तथाकथित ‘कोरियाई लव गेम’ केवल एक गेम नहीं था, बल्कि एक मानसिक जाल था, जिसने किशोर मन को वास्तविक दुनिया से काट दिया. टास्क-बेस्ड ऑनलाइन गेमिंग, काल्पनिक पहचान, और आभासी भावनात्मक लगाव. ये सब मिलकर बच्चों को एक ऐसी दुनिया में ले जाते हैं, जहां असफलता का अर्थ जीवन का अंत बताया जाता है. सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि ये तीनों बहनें कोविड काल से स्कूल से दूर थीं. यानी शिक्षा, मित्रता, खेलकूद और सामाजिक संवाद से कटाव. इसकी जगह स्क्रीन ने ले ली. स्मार्टफोन उनके लिए खिलौना नहीं, बल्कि दुनिया बन गया. जब माता-पिता ने फोन छीना, तो वह केवल एक डिवाइस नहीं गया, बल्कि उनकी ‘आभासी पहचान’ टूट गई. यही टूटन आत्महत्या जैसे भयावह कदम में बदल गई. यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या केवल बच्चों को दोष देना पर्याप्त है. उत्तर साफ है. नहीं. असल जिम्मेदारी समाज और पालकों की है. आज स्मार्टफोन कई घरों में ‘डिजिटल आया’ बन चुका है. बच्चा चुप रहे, इसके लिए फोन पकड़ा दिया जाता है. लेकिन वही फोन कब जहर बन जाएगा, इसका अंदाजा तब लगता है जब बहुत देर हो चुकी होती है. ऑनलाइन गेमिंग की लत एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है. यह धीरे-धीरे नींद, पढ़ाई, व्यवहार और भावनात्मक संतुलन को नष्ट करती है. बच्चे आभासी दुनिया को असली समझने लगते हैं. वहां मिलने वाली तारीफ, रैंकिंग और टास्क उनके आत्मसम्मान का आधार बन जाते हैं. वास्तविक दुनिया की डांट, अनुशासन या सीमाएं उन्हें असहनीय लगने लगती हैं.
यहां सरकार और टेक कंपनियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. भारत में अभी भी ऑनलाइन गेमिंग और बच्चों के डिजिटल कंटेंट पर सख्त निगरानी का अभाव है. माता-पिता को यह तक नहीं पता होता कि बच्चा कौन सा गेम खेल रहा है, किससे बात कर रहा है और किन मानसिक निर्देशों के प्रभाव में है.
अब समय आ गया है कि पालक ‘डिजिटल साक्षरता’ को उतनी ही गंभीरता से लें जितनी शिक्षा को. बच्चों से संवाद, उनके दोस्तों और ऑनलाइन गतिविधियों की जानकारी, समय सीमा और भावनात्मक सहारा. यह सब अनिवार्य होना चाहिए. डांट और प्रतिबंध के साथ-साथ विश्वास और बातचीत भी जरूरी है.
लोनी की यह घटना एक चेतावनी है. अगर अब भी हम नहीं चेते, तो स्क्रीन के इस अंधेरे में न जाने कितने बचपन बुझते चले जाएंगे. स्मार्टफोन स्मार्ट तभी है, जब उसका इस्तेमाल समझदारी से हो. वरना वह रिश्तों, संवेदनाओं और जीवन तीनों को निगल सकता है.
