निमाड़ में गहराता जल संकट, 500 फीट नीचे पहुंचा भूजल स्तर पुराने तालाब, बावड़ी और कुओं की उपेक्षा से बिगड़े हालात

बड़वानी। जिले के कई क्षेत्रों में अभी से भूमिगत जलस्रोत घट रहा है, जो गर्मी में गंभीर समस्या उत्पन्न कर सकता है। हालात ये हैं कि कई गांवों में भूजल स्तर 500 फीट से नीचे पहुंच गया है, जिससे उन क्षेत्रों में आने वाले समय में पानी तक की समस्या खड़ी हो सकती है। पुराने समय के जानकार इस संकट को पहले ही भांप चुके थे, इसी कारण उन्होंने हर मौसम में पानी की सहज उपलब्धता बनाए रखने के लिए सैकड़ों कुएं, बावडिय़ा और तालाबों का निर्माण कराया था, लेकिन समय के साथ इन पारंपरिक जलस्रोतों को भुला दिया गया और आज उसका दुष्परिणाम सामने है।
ग्रामीण यांत्रिकी विभाग के कार्यपालन यंत्री आरएस बामनिया ने बताया कि जिले में प्रधानमंत्री जल जीवन मिशन के तहत नल-जल योजना के तहत 336 गांवों को शामिल किया गया है। इनमें से 277 गांवों में योजना का कार्य पूर्ण हो चुका है और 245 गांवों में इसे पंचायतों को हस्तांतरित भी कर दिया गया है। शेष 59 गांवों में योजना प्रगति पर है। वहीं जिले के 55 ऐसे गांव हैं, जहां नल-जल योजना का कार्य अभी शुरू नहीं हो सका है, जिससे वहां पेयजल की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। जल संसाधन विभाग के कार्यपालन यंत्री पारस परमार ने बताया कि जिले के पाटी, पानसेमल, वरला, निवाली और सेंधवा विकासखंड कम जलस्तर वाले क्षेत्र हैं। निरीक्षण के दौरान वरला ब्लॉक के ग्राम विनायकी के स्कूल फलिया के नलकूप में जलस्तर 500 फीट से नीचे पाया गया। उन्होंने बताया कि पाटी विकासखंड के गंधावल क्षेत्र में बने बेड़दा तालाब से भूजल स्तर में वृद्धि हुई है, जिससे सिंचाई और पेयजल की समस्या का स्थायी समाधान संभव हो पाया है।
सिंचाई और पीने के पानी का मुख्य स्रोत बनी रही
विशेषज्ञों के अनुसार पश्चिम निमाड़ के नाम से विख्यात बड़वानी क्षेत्र अनियंत्रित बारिश और भूमिगत जल की सीमित उपलब्धता के कारण रियासतकाल में पूरे जिले में कई तालाब, बावड़ी और कुएं बनवाए गए थे। इन तालाबों को आपस में जोड़ा गया था, ताकि कहीं अधिक और कहीं कम वर्षा होने की स्थिति में जल संतुलन बना रहे। आजादी के बाद भी लंबे समय तक यही जल संरचनाएं सिंचाई और पीने के पानी का मुख्य स्रोत बनी रही और भूजल स्तर भी बढ़ा हुआ रहा, लेकिन समय के साथ सुविधाओं के विस्तार और उपेक्षा के चलते इन जलस्रोतों की देखरेख बंद हो गई। परिणामस्वरूप जिले के करीब 40 प्रतिशत तालाब या तो पूरी तरह लुप्त हो चुके हैं या अतिक्रमण की चपेट में आ गए हैं।
तालाबों की वास्तविक स्थिति
जल संरक्षण और जल संरचनाओं पर अध्ययन करने वाले इतिहासकार डॉ एसएन यादव बताते हैं कि रियासतकाल में जिले में कई छोटे-बड़े तालाबों का निर्माण किया गया था। वर्तमान में इनमें से बहुत कम तालाब ही अस्तित्व में हैं। अधिकांश तालाबों पर अतिक्रमण कर खेती शुरू कर दी गई है। सिंचाई विभाग के रिकॉर्ड में केवल 109 तालाब ही दर्ज हैं, जिनसे सिंचाई और पेयजल के लिए पानी उपलब्ध कराया जा रहा है। शेष तालाब विभागीय रिकॉर्ड में भी दर्ज नहीं हैं। डॉ यादव के अनुसार पुराने तालाबों का संरक्षण और नदियों से बहने वाले वर्षा जल का संग्रहण ही जल संकट से उबरने का एकमात्र उपाय है। डॉ यादव के अनुसार 30-35 वर्ष पहले अधिकांश गांवों में 50 से 60 फीट की गहराई पर ही पानी मिल जाता था। आज कई गांवों में 500 फीट तक नलकूप खनन के बाद भी पानी नहीं मिल पा रहा है। हालांकि जहां अभी भी जल उपलब्धता है, वहां 100 फीट के भीतर पानी मिल जाता है।
नई योजनाओं की तैयारी
जिले में 39 गांवों सहित अन्य एकल योजनाओं के लिए तालाब निर्माण की योजनाएं तैयार कर पोर्टल पर दर्ज कर दी गई हैं। शासन स्तर से स्वीकृति मिलते ही इन पर कार्य शुरू किया जाएगा। वर्तमान में 19 योजनाएं स्वीकृत हैं, जिनकी डीपीआर बनाकर प्रशासकीय स्वीकृति की प्रक्रिया चल रही है, जबकि कुछ योजनाओं में निविदाएं आमंत्रित की गई हैं।
पारस परमार, कार्यपालन यंत्री जल संसाधन विभाग संभाग बड़वानी

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