प्रार्थना

होश संभालते ही मनुष्य पाता है कि प्रार्थना जीवन में है ही। माता सिखाती है, सुबह आंख खोलते ही प्रार्थना करो, फिर बिस्तर छोड़ो, घर से निकलने से पहले मंदिर में हाथ जोड़ो, पाठशाला में गुरु पहले प्रार्थना ही कराते हैं, फिर कक्षा गमन होता है। हिन्दू धर्म में अलग-अलग देवता अलग-अलग शक्तियों के अधिष्ठाता हैं। जैसे लक्ष्मी श्री की, हनुमानजी बल के, देवी शक्ति की आदि-आदि। यानी हम सब की प्रार्थना द्वारा ये सब गुण ही जीवन में कृपा स्वरूप चाहते हैं। जीवन के मीठे-कडुवे अनुभवों से गुजरते, चढ़ते- उतरते, प्रार्थना के प्रति हमारी श्रद्धा नित प्रतिदिन गहराती जाती है। ईश्वर अनुकम्पा स्वरूप कुछ पाया तो धन्यवाद रूप में प्रार्थना, कुछ मनोकामना हुई तो याचक के रूप में, खोया तो मन की शांति के लिए, महाप्रयाण के बाद आत्मा की शांति के लिए। वह प्रार्थना ही है, जिसका रूप बदलता है, पर वह सभी धर्मों में मान्य है, महत्वपूर्ण है, दिनचर्या में शामिल है एवं सभी को उस पर विश्वास है।

प्रार्थना कब और कैसे करते हैं, यह तो हर मनुष्य को संस्कार में मिलता है। संत-महात्मा सामूहिक प्रार्थना का महत्व व फल भी बताते हैं। एक स्वर से की हुई प्रार्थना की गूंज प्रतिध्वनित हो व्यक्ति के हृदय में काफी देर गूंजती है। साकार भक्ति में मूर्ति के सामने प्रार्थना है, निराकार में घर घड़ी। मुस्लिम समुदाय में तो समय के साथ जोड़ दिया है। वक्त हुआ चादर बिछाई और प्रार्थना की। प्रार्थना दरअसल है क्या, प्रार्थना दिमाग का नहीं, श्रद्धा का विषय है एवं श्रद्धा बुद्धि से नहीं मन से होती है। कहते हैं, सच्चे मन से पुकारो, प्रभु सुनेगा। अत: मन को समझना आवश्यक है। हमारा ये मन आठ हिस्सों में विभक्त है। एक हिस्सा चैतन्य व सात हिस्से अवचेतन मन के हैं। मन का बड़ा हिस्सा है अवचेतन मन। शांत स्वरूप, परम आज्ञाकारी, तर्क-वितर्क से परे है। इसकी स्मृति विलक्षण है एवं सुप्तावस्था में इसमें इस ही नहीं, कई जन्मों की स्मृति दर्ज है। चेतन मन, मन का छोटा पर खोटा हिस्सा है। सच-झूठ, संकल्प-विकल्प, मान-अपमना, क्रोध, राग-द्वेष, बहाने, हठ, सब इसी में होते हैं। यह स्वभाव से असंतुष्ट है एवं छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए प्रभु को पुकारता है।

हम अपने जीवनकाल में विपरीत या अनुकूल परिस्थिति में तृप्त या अतृप्त, संतुष्ट या असंतुष्ट मन को लेकर अपने इष्ट, गुरु या पूज्य की शरण में जाते हैं। उनके समक्ष श्रद्धाभाव से हाथ जोड़ते ही मन की हलचल बंद हो जाती है। चंचल मन शांत होकर, अवचेतन के सात हिस्सों में मिलकर एकाकार हो जाता है और एकाग्रता की स्थिति का निर्माण होता है। जहां सिर्फ सकारात्मक आत्मसमर्पण या विश्वास है, शांति है। चेतन मन की हलचल रुकते ही हमारी चाहत अवचेतन में पहुंच जाती है एवं संकल्प दृढ़ हो अपनी कृपा अपने ही ऊपर हो जाती है और हम कहते हैं- प्रभु ने हमारी प्रार्थना सुन ली, या बड़ों के आशीर्वाद से प्रार्थना फलीभूत हुई अथवा गुरुकृपा हो गई। प्रार्थना की स्थिति या प्रार्थना की भावना मनुष्य की ऊंची स्थिति है। क्योंकि इस अवस्था में मनुष्य का अहंकार शून्यावस्था में होता है- यदि प्रार्थना सच्चे दिल से की गई हो तो। इस दर्शन को समझने के बाद यदि हम अभ्यास करते हैं तो चंचल मन की पल-पल बदलने वाली स्थिति को काबू करना सरल हो जाता है।

-विनीता जाजू

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