मुंबई | महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और एनसीपी (अजित गुट) के प्रमुख अजित पवार के आकस्मिक निधन ने भारतीय राजनीति में एक ऐसा शून्य पैदा कर दिया है जिसे भरना नामुमकिन है। 22 जुलाई 1959 को जन्मे अजित पवार का जीवन संघर्षों की मिसाल रहा है। पिता के जल्दी चले जाने के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी, लेकिन इसी चुनौती ने उन्हें जमीन से जुड़ा नेता बनाया। 1982 में सहकारी चीनी कारखाने से अपनी पारी शुरू करने वाले ‘दादा’ ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की समस्याओं को बहुत करीब से समझा, जो बाद में उनकी राजनीति का मुख्य आधार बनी।
अजित पवार को महाराष्ट्र की राजनीति का ‘किंगमेकर’ माना जाता था। उन्होंने अपने चाचा शरद पवार की छत्रछाया में राजनीति सीखी, लेकिन जरूरत पड़ने पर उनसे बगावत करने में भी पीछे नहीं रहे। साल 2019 में देवेंद्र फडणवीस के साथ तड़के सुबह ली गई शपथ हो या जुलाई 2023 में पार्टी को दो फाड़ कर भाजपा-शिंदे सरकार में शामिल होना, अजित पवार ने हर बार अपनी राजनीतिक चतुरता से विरोधियों को चौंकाया। 2024 के विधानसभा चुनाव में 41 सीटें जीतकर उन्होंने साबित कर दिया था कि महाराष्ट्र की सत्ता का समीकरण उनके बिना अधूरा है।
व्यक्तिगत जीवन में अजित पवार अपनी बेबाकी और अनुशासन के लिए जाने जाते थे। पत्नी सुनेत्रा पवार और बेटों जय व पार्थ पवार के साथ उनका गहरा जुड़ाव था। हालांकि उनके बेटे पार्थ को राजनीति के शुरुआती दौर में संघर्ष करना पड़ा, लेकिन अजित पवार हमेशा अपनी विरासत को मजबूत करने में जुटे रहे। बारामती एयरपोर्ट पर हुए इस दर्दनाक हादसे ने न केवल उनके परिवार को, बल्कि उन लाखों समर्थकों को भी झकझोर दिया है जो उन्हें ‘दादा’ कहकर पुकारते थे। महाराष्ट्र ने आज एक ऐसा मराठा क्षत्रप खो दिया है, जो कभी सत्ता के केंद्र से बाहर नहीं रहा।

