उच्चतम न्यायालय ने ‘हेट स्पीच’ पर दायर याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा

नयी दिल्ली, 20 जनवरी (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने देश भर में भड़काऊ भाषण (हेट स्पीच) की घटनाओं के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई संबंधी निर्देश देने वाली याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मंगलवार को अपना आदेश सुरक्षित रखते हुए संबंधित पक्षों को दो सप्ताह के भीतर संक्षिप्त लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया।

इन याचिकाओं पर सुनवाई न्यायालय के उन पिछले निर्देशों की पृष्ठभूमि में हो रही है, जिनमें कहा गया था कि भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए, 153बी, 295ए और 505 के तहत अपराध की श्रेणी में आने वाले भाषणों पर अधिकारियों को बिना किसी औपचारिक शिकायत के भी स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करनी चाहिए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल, एम.आर. शमशाद, संजय पारिख और संजय हेगड़े के साथ अधिवक्ता निज़ाम पाशा पेश हुए। अतिरिक्त महान्यायवादी एस.वी. राजू और वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व किया।

कई याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता निज़ाम पाशा ने ‘हेट स्पीच’ के खिलाफ कार्रवाई करने में कानून प्रवर्तन एजेंसियों की लगातार हिचकिचाहट की ओर इशारा किया, विशेष रूप से तब जब आरोपी सत्ताधारी प्रतिष्ठानों से जुड़े होते हैं। उन्होंने दलील दी कि समस्या कानूनी प्रावधानों के अभाव में नहीं, बल्कि उनके खराब क्रियान्वयन में है।

श्री पाशा ने तर्क दिया कि न्यायालय के बार-बार के निर्देशों के बावजूद ‘संदिग्ध’ बेखौफ होकर भड़काऊ भाषण देना जारी रखते हैं। प्राथमिकी के बाद अक्सर गिरफ्तारियां नहीं होती हैं और अधिकारी तब भी कार्रवाई करने में विफल रहते हैं, जब कार्यक्रमों के विज्ञापन में पहले से ही हेट स्पीच का स्पष्ट संकेत मिल रहा होता है।

याचिकाकर्ताओं ने डिजिटल युग में हेट स्पीच के बदलते स्वरूप को भी रेखांकित किया। वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने एक एआई निर्मित वीडियो का हवाला दिया, जिसमें कथित तौर पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिए सांप्रदायिक बात कही गयी थी। उन्होंने ‘हेट स्पीच’ के मामले में ‘मंजूरी की कमी’ के आधार पर प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार करने पर भी चिंता जताई। उन्होंने तर्क दिया कि मंजूरी केवल संज्ञान लेने के चरण में आवश्यक होती है, न कि प्राथमिकी दर्ज करने या जांच के लिए।

वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने बताया कि कैसे ‘हेट स्पीच’ अब एक चक्र का पालन करती है, जो एक नारे या वाक्यांश के रूप में शुरू होती है, सोशल मीडिया के माध्यम से फैलती है और अंततः जन संचार द्वारा उसे और भी बढ़ाया जाता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता एम.आर. शमशाद और अधिवक्ता अमित पई ने भी कहा कि पुलिस अधिकारी अक्सर पूर्व सरकारी मंजूरी पर गलत तरीके से जोर देकर प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर देते हैं। यह स्पष्ट किया गया कि मंजूरी संज्ञान के स्तर पर आवश्यक हो सकती है, लेकिन यह प्राथमिकी दर्ज करने के लिए पूर्व शर्त नहीं है।

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने तर्क दिया कि ‘हेट स्पीच’ से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए ‘तहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ’ मामले में जारी दिशा-निर्देशों को मजबूत करने और उनमें संशोधन करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यह सुझाव भी दिया गया कि ‘हेट स्पीच’ को ‘संवैधानिक अपकृत्य’ माना जाना चाहिए और इसे संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।

केंद्र की ओर से जवाब देते हुए अतिरिक्त महान्यायवादी एस.वी. राजू ने कहा कि अदालत के निर्देशों का काफी हद तक पालन किया गया है। उन्होंने बताया कि रिपोर्ट की गई अधिकांश घटनाओं में प्राथमिकी दर्ज की गई हैं, जबकि अन्य मामलों में जांच में कोई अपराध नहीं पाया गया।

न्यायालय ने मुख्य याचिकाओं पर आदेश सुरक्षित रखते हुए स्पष्ट किया कि ‘काजीम अहमद शेरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य’ मामले पर बाद में अलग से सुनवाई की जाएगी। यह मामला नोएडा में एक मुस्लिम मौलवी के खिलाफ 2021 के कथित नफरत भरे भाषण से संबंधित है।

सभी पक्षों को दो सप्ताह के भीतर संक्षिप्त नोट दाखिल करने का निर्देश दिया गया। नवंबर 2023 में, भारत सरकार ने एक यथास्थिति रिपोर्ट दाखिल की थी, जिसमें बताया गया था कि पूनावाला मामले के निर्देशों के अनुपालन में 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने नोडल अधिकारी नियुक्त किए हैं।

उच्चतम न्यायालय ने पहले भी स्पष्ट किया है कि उसका इरादा ‘हेट स्पीच’ की हर व्यक्तिगत घटना की निगरानी करना या कानून बनाना नहीं है, क्योंकि इसके लिए मौजूदा कानूनी तंत्र, पुलिस अधिकारी और उच्च न्यायालय मौजूद हैं। न्यायालय ने जोर देकर कहा है कि उसकी भूमिका एक प्रभावी कार्यान्वयन ढांचा सुनिश्चित करने तक सीमित है, जबकि व्यक्तिगत शिकायतों का समाधान संबंधित उच्च न्यायालयों के समक्ष किया जाना चाहिए।

 

 

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