“पंडुम” शब्द के प्रयोग पर आदिवासी समाज की आपत्ति: मुख्यमंत्री और राज्यपाल को ज्ञापन

बीजापुर, (वार्ता) छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए “पंडुम” शब्द के इस्तेमाल पर आदिवासी समाज ने कड़ी नाराजगी जताई है।

सर्व आदिवासी समाज, बीजापुर ने इस संबंध में कलेक्टर संबित मिश्रा के माध्यम से मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और राज्यपाल रामेन डेका को एक औपचारिक ज्ञापन भेजा है। समाज का कहना है कि इस पवित्र शब्द का सामान्य आयोजनों के लिए उपयोग उनकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ है।

ज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि “पंडुम” कोई साधारण मेला या उत्सव नहीं, बल्कि एक अत्यंत पवित्र धार्मिक परंपरा और देव-आह्वान की विधि है। इस प्रक्रिया में पारंपरिक पुजारियों की उपस्थिति, विशेष स्थान और ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य होती है। आदिवासी नेताओं का आरोप है कि सरकारी कार्यक्रमों में बिना धार्मिक मर्यादाओं के इस शब्द का प्रयोग उनकी सांस्कृतिक पहचान और आस्था को चोट पहुंचा रहा है।

समाज ने संविधान के अनुच्छेद 244, 29 और पेसा अधिनियम 1996 का हवाला देते हुए कहा है कि अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी परंपराओं की रक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व है। उनका तर्क है कि ग्रामसभा की अनुमति के बिना पारंपरिक शब्दावली का सरकारी उपयोग पेसा कानून की मूल भावना के विपरीत है। यह मांग की गई है कि “बस्तर पंडुम” शब्द का इस्तेमाल सरकारी दस्तावेजों और प्रचार सामग्री से तत्काल हटाया जाए।

सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष जगुराम तेलामी ने चेतावनी दी है कि भविष्य में किसी भी पारंपरिक शब्द के उपयोग से पहले स्थानीय समुदाय की सहमति ली जानी चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रशासन इस संवेदनशील मामले पर शीघ्र निर्णय लेगा। अब सभी की नजरें राज्य सरकार के रुख पर टिकी हैं कि वह आदिवासी समाज की इस सांस्कृतिक चिंता का समाधान कैसे करती है।

 

 

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