नई दिल्ली | 10 जनवरी, 2026: चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अब किसी भी तरह की असहमति को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। हाल ही में हेनान प्रांत के श्रमिक कार्यकर्ता शिंग वांगली को “झगड़ा भड़काने” के अस्पष्ट आरोप में तीन साल की सजा सुनाई गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन में वकीलों, छात्रों और मजदूरों को निशाना बनाना अब एक व्यवस्थित पैटर्न बन चुका है। जो भी व्यक्ति सरकार की नीतियों या व्यवस्था पर सवाल उठाता है, उसे जेल भेजकर खामोश कर दिया जा रहा है, जिससे पूरे देश में भय का माहौल है।
मानवाधिकार संगठनों ने चीन की गिरती न्यायिक व्यवस्था पर गहरी चिंता जताई है। यहाँ हिरासत में लिए गए बंदियों को न तो वकीलों से मिलने दिया जा रहा है और न ही उनके परिजनों को कोई जानकारी दी जा रही है। विशेष रूप से मानवाधिकार वकीलों को उनके लाइसेंस रद्द करने या मनमानी हिरासत में लेने की धमकियां दी जा रही हैं। छात्रों, जो अक्सर सामाजिक न्याय की मांग उठाते हैं, उन्हें भी राज्य विरोधी गतिविधियों के नाम पर कड़ी सजाएं दी जा रही हैं। निष्पक्ष सुनवाई की संभावनाएं लगभग खत्म हो चुकी हैं और कानून का इस्तेमाल अब केवल जनता के दमन के लिए एक हथियार के रूप में हो रहा है।
चीनी सरकार ने न केवल सड़कों पर बल्कि ऑनलाइन दुनिया में भी निगरानी का एक ऐसा जाल बिछा दिया है, जिससे कोई भी टिप्पणी बच नहीं पाती। अत्याधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए हर नागरिक की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। ऑनलाइन टिप्पणीकारों और धार्मिक अनुयायियों को “अपारदर्शी” कानूनी सजाओं के जरिए डराया जा रहा है। म्यांमार के मीडिया आउटलेट ‘मिज़्ज़िमा न्यूज़’ की रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद बीजिंग अपनी दमनकारी नीतियों को बदलने को तैयार नहीं है। यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।

