
ग्वालियर। एमपी हाईकोर्ट की एकल पीठ ने बलात्कार, धमकी और उगाही के आरोपों से जुड़ी एक एफआईआर को रद्द कर दिया है। कोर्ट का कहना है कि ये आरोप भरोसेमंद नहीं हैं और बदले की भावना से लगाए गए लगते हैं। कोर्ट ने कहा कि शिकायत में बताए गए तथ्य सामान्य समझ से मेल नहीं खाते। जैसे किसी सार्वजनिक जगह से अपहरण, 20 लाख रुपए की मांग और दुष्कर्म जैसी गंभीर घटना के बाद भी न तो तुरंत शिकायत की गई और न ही कोई मेडिकल जांच कराई गई। इसके अलावा, घटना की कोई स्वतंत्र पुष्टि भी नहीं है।
कोर्ट ने जांच में कई गंभीर गड़बड़ियां भी पाईं। खास तौर पर यह बात गंभीर मानी गई कि धारा 164 के तहत दर्ज बयान जैसे गोपनीय दस्तावेज शिकायतकर्ता के पास पाए गए, जिससे पुलिस जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। सिरोल थाने में दर्ज इस मामले की पूरी कार्रवाई को अब रद्द कर दिया गया है।
शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने उससे 20 लाख रुपए की मांग की, झूठे केस में फंसाने की धमकी दी और फिर कार में बैठाकर सुनसान जगह ले जाकर दुष्कर्म किया। यह एफआईआर घटना के करीब आठ महीने बाद दर्ज कराई गई थी। महिला ने देरी का कारण डर और सामाजिक दबाव बताया था। आरोपी की ओर से अदालत में कहा गया कि यह केस जानबूझकर झूठा और दुर्भावना से दर्ज कराया गया है। वकील ने बताया कि जिस दिन यह एफआईआर दर्ज हुई, उसी दिन पहले आरोपी की बेटी ने शिकायतकर्ता के पति के खिलाफ गंभीर यौन अपराध की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद यह केस सामने आया, जिससे साफ होता है कि यह बदले की कार्रवाई है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों में देरी हमेशा गलत नहीं मानी जाती, लेकिन यहां आठ महीने की देरी का कोई ठोस कारण नहीं बताया गया।
