मुंबई | 04 अप्रैल, 2026: आज के दौर में जहां नितेश तिवारी की ‘रामायण’ जैसी फिल्में हजारों करोड़ के बजट में बन रही हैं, वहीं 39 साल पहले रामानंद सागर ने महज 7 से 9 करोड़ रुपये में भारतीय टेलीविजन का सबसे बड़ा इतिहास रच दिया था। 1987 में प्रसारित इस पौराणिक सीरीज के प्रत्येक एपिसोड पर करीब 9 लाख रुपये खर्च होते थे। उस समय आधुनिक वीएफएक्स (VFX) या हाईटेक कंप्यूटर ग्राफिक्स मौजूद नहीं थे, लेकिन मेकर्स ने अपनी अद्भुत रचनात्मकता से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। धुंध और कोहरे के प्रभाव के लिए अगरबत्ती के धुएं का इस्तेमाल किया जाता था, जबकि आसमान में तैरते बादलों को दिखाने के लिए साधारण रुई का सहारा लिया गया था।
रामायण के दृश्यों को भव्यता देने के लिए उस दौर में ग्लास पेंटिंग और मिनिएचर मॉडल्स (छोटे मॉडल) का बखूबी प्रयोग किया गया था। स्वर्ग, विशाल पर्वत और ऊंचे महलों को दिखाने के लिए छोटे आकार के ढांचे बनाए जाते थे और उन्हें कैमरे के कोणों से इस तरह फिल्माया जाता था कि वे पर्दे पर असली और विशाल नजर आते थे। युद्ध के दृश्यों में तीरों के टकराने और जादुई शक्तियों को दिखाने के लिए ‘एसईजी 2000’ जैसी मशीनों का उपयोग हुआ, वहीं नकली अंगों और सजावट के लिए प्लास्टर ऑफ पेरिस का सहारा लिया गया। इन साधारण तकनीकी प्रयोगों ने आस्था और कला का ऐसा संगम पेश किया कि दर्शक भावविभोर हो उठे।
रामानंद सागर की इस कृति ने न केवल तकनीकी सीमाओं को तोड़ा, बल्कि अरुण गोविल को भगवान राम और दीपिका चिखलिया को माता सीता के रूप में घर-घर में पूजनीय बना दिया। आज भी जब रामायण की चर्चा होती है, तो इन कलाकारों की छवि सबसे पहले जेहन में आती है। यह सीरीज साबित करती है कि किसी महाकाव्य को पर्दे पर उतारने के लिए केवल भारी-भरकम बजट ही काफी नहीं होता, बल्कि मजबूत पटकथा, समर्पण और मौलिक सोच की अधिक आवश्यकता होती है। यही कारण है कि दशकों बाद भी इस ‘रामायण’ की लोकप्रियता कम नहीं हुई है और यह भारतीय संस्कृति व डिजिटल मनोरंजन के इतिहास में एक स्वर्ण युग के रूप में दर्ज है।

