ग्वालियर: शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में देश और दुनिया के सर्वाधिक प्रतिष्ठित महोत्सवों में से एक “तानसेन समारोह” की बेला नजदीक आ गई है। इस बार तानसेन समारोह का 101वां संस्करण है। विश्व संगीत समागम तानसेन समारोह के पूर्वरंग की सुगंधमयी संध्या दतिया स्थित अवध बिहारी मंदिर परिसर में सजी। यह संध्या तब और दिव्य हो उठी, जब दीप प्रज्वलन और माँ सरस्वती के माल्यार्पण के साथ रागों की पावन साधना ने मंदिर प्रांगण को सुरमय बना दिया। वातावरण में उठती धूप की महक, दीपों की आभा और श्रोताओं की शांत व्यग्रता ने सब मिलकर ऐसे दृश्य रचे मानो स्वयं मां वीणा वादिनी इस संगम को आशीष दे रही हों। यह पूर्वरंग सभा सुर सम्राट तानसेन के अलौकिक राग-रंग से गूँज उठी।
इस सभा के प्रथम कलाकार के रूप में इंदौर के सुप्रसिद्ध वायलिन वादक पं. बृजमोहन बमरेले ने अपने नयनाभिराम वादन से ऐसा जादू जगाया कि श्रोता सुर–सरिता में अवगाहित हो गए। राग रागेश्री की विलंबित एकताल में आलाप–गत और तत्पश्चात द्रुत तीनताल में उनकी प्रस्तुति ने पूरे मंच को दिव्यता से आच्छादित कर दिया। उनके साथ तबले पर इंदौर के गांधार राजहंस की संगत ने प्रस्तुति को और अधिक दैदीप्यमान बना दिया। दूसरी प्रस्तुति उज्जैन की मधुर-स्वर साधिका साक्षी पंडोले की रही, जिनकी सुर–लहरियों ने वातावरण में मरीचिका-सा सौंदर्य घोल दिया।
उन्होंने राग मारवा में बड़ा ख्याल “पिया मोरे अनत देश गईलवा…” और छोटा ख्याल “ओ गुनियन मिल…” प्रस्तुत किया। राग भैरवी के टप्पा से उन्होंने अपनी प्रस्तुति का ऐसा मनोहारी समापन किया कि तालियों की गूँज देर तक मंदिर की दीवारों में प्रतिध्वनित होती रही। तबले पर राजेंद्र करहाड़कर, हारमोनियम पर अक्षत मिश्रा, तथा तानपुरा संगत में साकेत कुमार और योगिनी ताम्बे ने रस-भव्यता को पूर्णता प्रदान की।
तीसरी प्रस्तुति में भोपाल के युवा सितार वादक अनिरुद्ध जोशी ने राग बिहाग का मंगलाचरण आलाप–जोड़–झाला के साथ इस निपुणता से किया कि उनकी उंगलियों से फूटते हर मींड और गमक में ऋतु–वसंत का सजीव दर्शन होता रहा। विलंबित और द्रुत तीनताल की गतों ने उनकी कला साधना को अद्भुत आभा दी।स्थानीय कला-गौरव की चमक तब दिखाई दी जब चौथी प्रस्तुति में दतिया की प्रतिभावान गायिका मुस्कान अग्रवाल मंच पर आईं।
राग बिहाग की विलंबित एकताल में बंदिश “कैसे सुख तोहे…” और तीनताल की बंदिश “बालम रे मोर मन के…” ने श्रोताओं के मन में भावों की नई तरंगें जगाईं। उनके स्वरों में दतिया की सांस्कृतिक मिट्टी की सुगंध थी। तबले पर सार्थक शर्मा और हारमोनियम पर सुबोध देव की संगत ने प्रस्तुति को और मधुर बना दिया।संध्या का सौंदर्यमयी समापन मां पीतांबरा की वंदना से हुआ। राग बागेश्री में पंडित मधुकर मिश्र की रचना “जयति जयति श्री पीतांबरा…” जब गुंजित हुई, तो पूरा प्रांगण भक्ति–रस में भींग उठा। ऐसा लगा जैसे सुर और श्रद्धा एक ही धारा बनकर बहने लगे हों। कार्यक्रम का संचालन राजेश लिटोरिया ने किया।
