नक्सल मुक्त एमपी की ओर बढ़ते कदम

बालाघाट में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मौजूदगी में 10 हार्डकोर नक्सलियों का आत्मसमर्पण केवल एक प्रशासनिक सफलता नहीं, बल्कि एक मानसिक, सामाजिक और रणनीतिक विजय का संकेत है. यह उस लंबी लड़ाई का महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो प्रदेश ने दशकों तक लाल आतंक के खिलाफ लड़ी है. जिस धरती पर कभी नक्सलियों की बंदूकें राज्य की संप्रभुता को चुनौती देती थीं, वहीं आज वही हथियार लोकतंत्र की ओर बढ़ते कदमों के सामने झुकते दिखे—यह दृश्य किसी भी जागरूक समाज के लिए आश्वस्त करने वाला है. इन 10 नक्सलियों में चार महिला नक्सलियों का शामिल होना अपने आप में दर्शाता है कि अब जंगलों में छिपकर हिंसा की राजनीति करने वाले गिरोह अपनी ही वैचारिक थकान और नेतृत्वहीनता के भार तले टूट रहे हैं. सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इन सभी पर 2 करोड़ 36 लाख रुपये का इनाम घोषित था. विशेष रूप से सुरेंद्र उर्फ कबीर पर अकेले 62 लाख का इनाम होना बताता है कि यह आत्मसमर्पण महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि नक्सली नेटवर्क को मिली गहरी चोट है.

मुख्यमंत्री के हाथों एके-47 और इंसास राइफल जैसे घातक हथियारों का समर्पण, कई मायनों में यह जताता है कि जंगलों की हिंसक सत्ता अब लोकतंत्र के आगे ढह रही है. इन हथियारों का जमीन पर गिरना, उन तमाम निर्दोष आदिवासियों और सुरक्षाकर्मियों की याद को भी सम्मान देता है, जिन्होंने नक्सली हिंसा के कारण अपनी जान गंवाई.

डॉ. मोहन यादव द्वारा आत्मसमर्पित नक्सलियों को संविधान की प्रति भेंट करना एक गहरा संदेश है कि समर्पण केवल राज्य के सामने झुकना नहीं, बल्कि एक नए जीवन का आरंभ है. यही वह मानवीय दृष्टि है जो नक्सल समस्या का वास्तविक समाधान तलाशती है. ‘पुनर्वास से पुनर्जीवन’ कार्यक्रम इसी सोच का विस्तार है, जिसमें राज्य हिंसा छोडक़र लौटने वालों को सुरक्षा, सम्मान और उद्यमिता के अवसर प्रदान कर रहा है. यह नीति बताती है कि सरकार

प्रतिहिंसा नहीं, पुनरुत्थान पर विश्वास रखती है. मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए शब्द कि ‘लाल सलाम को अब आखिरी सलाम देने का समय आ गया है ‘,प्रदेश की दृढ़ मंशा का स्पष्ट ऐलान हैं. केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा निर्धारित नक्सल मुक्त भारत की रणनीति के अनुरूप, मध्य प्रदेश उस लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है. नक्सलवाद के खिलाफ यह व्यापक मोर्चा केवल बंदूक और ऑपरेशन का परिणाम नहीं, बल्कि राज्य की मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, बेहतर खुफिया तंत्र, पुलिस-फोर्स का समन्वित अभियान और जमीनी स्तर पर विकास को प्राथमिकता देने की रणनीति का नतीजा है. बालाघाट, मंडला, डिंडौरी और छिंदवाड़ा जैसे क्षेत्र, जो कभी नक्सली गतिविधियों के कारण भय का पर्याय बन गए थे, अब विकास और आत्मविश्वास की ओर बढ़ रहे हैं. जंगलों में सडक़ें, गांवों में उजाला और युवाओं के हाथों में रोजगार जैसे बदलाव नक्सलियों की जनाधार राजनीति को तेज़ी से खत्म कर रहे हैं. यह आत्मसमर्पण एक संदेश भी है कि हिंसा की राह अंत में अंधेरे की ओर ही ले जाती है, किंतु लोकतंत्र और विकास की मुख्यधारा हर भटके कदम का स्वागत करने को तैयार है. मध्य प्रदेश के इस निर्णायक मोड़ को केवल एक सफलता के रूप में नहीं, बल्कि नक्सल मुक्त भविष्य की नींव के रूप में देखना चाहिए.

अब लक्ष्य स्पष्ट है कि नक्सलवाद की छाया को प्रदेश की सीमाओं से स्थायी रूप से हटाना है. जाहिर है बालाघाट का यह अध्याय इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम साबित होगा.

 

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