बालरंग: 14 राज्य, 5 केंद्र शासित प्रदेश सहित 373 बच्चों ने दी प्रस्तुति

भोपाल: मानव संग्रहालय स्थित बालरंग महोत्सव में हर किसी की नजरें बस मंच पर टिक गई हों और दर्शकों तालियों की गड़गड़ाहट विधयर्थियों के स्वागत में मंच तक पहुंच रही थी. यह अवसर शुक्रवार को आयोजित राष्ट्रीय बालरंग 2025 का था. जब लोक कलाओं और विविध नृत्यों की प्रस्तुति देश भर से आये 14 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों के छात्र -छात्राओं द्वारा दी जा रही थी. इस बार के बालरंग महोत्सव में लगभग 373 बच्चों ने प्रस्तुति दी.

महोत्सव में पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड, गुजरात, कर्नाटक, गोवा, आंध्रप्रदेश, चंडीगढ़ जैसे कई राज्योन से बच्चे शामिल होकर अपने प्रतिभाओं को मंच पर दिखते नजर आये.पहली बार इतने बड़े मंच पर अपने पारम्परिक नृत्य को दिखाने का अवसर मिल रहा है. हमारे नृत्य में राठवा आदिवासी के लोग खेतों में फसल उगाने के बाद इकट्ठे होकर उत्साह में त्यौहार मनाते हैं. उनके इसी त्योहार को राठवा जनजाति लोक नृत्य के जरिये मंच पर दिखाने की कोशिश की है. इसमें कई परम्परिक उपकरणों का उपयोग किया गया है, जिससे उस समय होने वाले दृश्य को वास्तविक रूप से दिखाया जा सके.

अमित भिलाला, लोक विद्यालय गुजरात

हमने ब्रज मयूर होली नृत्य की प्रस्तुति दी है. इसमें ब्रज में होने वाली फूलों की होरी का मंचन किया है. साथ ही इसके गीत वाद्य यंत्र सब कुछ हमारी टीम के लोगों ने खुद ही बजाया और गाया है. इस नृत्य के जरिये भारतीय संस्कृति की अनूठी झलक में कृष्ण प्रेम को दर्शाने का प्रयास किया है. लगभग 15 दिन के समय में हमने ये नृत्य सावित्री चौहान और अन्य अध्यापिकाओं के नेतृत्व में सीखा हैं।
प्रियांशु शाहा, चरकुला ग्लोबल पब्लिक स्कूल, मथुरा
हमारे नृत्य का नाम पूजा कुनिता है. यह कर्नाटक का लोक नृत्य है. जिसका मतलब पूजा या भक्ति का नृत्य है. इसमें शक्तिशाली शारीरिक करतब, कलाबाजियां (जैसे 50 किलो तक वजन उठाना) और पारंपरिक प्रार्थनाएं शामिल है. जिसे ड्रम, तरसी और नागराई जैसे वाद्य यंत्रों की ताल पर किया जाता है। यह आध्यात्मिक जुड़ाव, पूर्वजों की याद और सामुदायिक के आनंद का उत्सव है. जिसकी प्रस्तुति हमारी टीम ने यहां मंच पर दी है.
नवा अरबाज, एनके बगरोडिया पब्लिक स्कूल, दिल्ली
पहाड़ी गानों पर हमने कश्मीर के परम्परिक लोक नृत्य की प्रस्तुति दी है. इसमें सबसे खास हमारा पहनावा होता है, चौरी, कल्ली जंजीरिया, चन्द्रहार ये सब आभूषण हम पहनते हैं. इससे एक अलग पारम्परिक वेशभूषा तैयार होती है. और जब हम नगाड़े, ढोल, कंसाल, की धुन पर नृत्य करते हैं, तो बहुत ही मनमोहक दृश्य देखने को मिलता है. इस नृत्य में हम महाराज जी की जो हमारे देवता होते हैं उनकी पूजा करते हैं. इसे तैयार करने में हमें करीब 2 महीने का समय लगा.
आभा दीक्षा, गवर्नमेंट गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल, रोढुं, हिमाचल प्रदेश

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