जोहान्सबर्ग में संपन्न हुए जी – 20 शिखर सम्मेलन ने केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तय नहीं की, बल्कि एक उभरती हुई सत्यता को भी रेखांकित किया है कि भारत अब वैश्विक बहसों का सहभागी मात्र नहीं, बल्कि एक निर्णायक नेतृत्वकर्ता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन इस बदलती वैश्विक वास्तविकता का सबसे मजबूत प्रमाण बना, जिसमें उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भारतीय सभ्यता-परंपरा को आधुनिक वैश्विक शासन मॉडल में ढालने का प्रयास किया. मोदी का भाषण कूटनीति की सामान्य औपचारिकताओं से अलग था. यह एक ऐसा ‘एजेंडा फॉर एक्शन’ था, जिसके केंद्र में ग्लोबल साउथ के वे करोड़ों लोग थे, जो अब तक विकास की मुख्य धारा से बाहर कर दिए गए थे.भारत ने जिस स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ विकासशील देशों की चिंताओं को उठाया, उसने जी – 20 मंच को अधिक व्यापक, अधिक न्यायसंगत और अधिक उत्तरदायी बनाने की दिशा में नई ऊर्जा भरी. प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया के सामने एक पांच-सूत्रीय रोड मैप रखा, जो यह संदेश देता है कि 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति सहयोग और साझा जिम्मेदारी पर आधारित होनी चाहिए. अफ्रीकी संघ को जी – 20 का स्थायी सदस्य बनाने का प्रस्ताव इतिहास में दर्ज होने योग्य कदम है. इससे न केवल अफ्रीका की आवाज़ को सम्मान मिला, बल्कि यह भी स्पष्ट हुआ कि भारत वास्तविक ‘भागीदारी आधारित विकास’ का समर्थक है.
इसी तरह ग्लोबल ट्रेडिशनल नॉलेज रिपॉजिटरी का प्रस्ताव यह याद दिलाता है कि विश्व स्वास्थ्य व्यवस्था केवल आधुनिक तकनीक पर नहीं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान की समृद्ध विरासत पर भी खड़ी हो सकती है. आज जब विश्व औषधियों, योग, आयुर्वेद और प्राकृतिक उपचार की ओर लौट रहा है, तब यह मंच एक महत्वपूर्ण वैश्विक संसाधन बन सकता है.
अफ्रीका स्किल्स मल्टीप्लायर पहल, जहां भारत 10 लाख प्रशिक्षकों को प्रशिक्षित करेगा, यह केवल सहायता मूलक कार्यक्रम नहीं है,
यह रोजगार, दक्षता और जन-सशक्तीकरण पर आधारित एक दीर्घकालिक सामरिक साझेदारी है.इससे भारत-अफ्रीका संबंधों का नया अध्याय खुलेगा, जिसमें नैतिकता और विकास दोनों का संतुलन होगा. इसके अलावा
ड्रग-टेरर नेक्सस पर भी मोदी की चेतावनी समयोचित है. यह नेटवर्क दुनिया की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है. भारत ने जिस दृढ़ता से समन्वित वैश्विक कार्रवाई की मांग की, वह इस दिशा में बड़ा सामरिक कदम है.
जलवायु न्याय,यह वह शब्द है, जिसे भारत ने वैश्विक विमर्श में स्थापित किया है.मोदी ने इसे फिर दोहराया कि विकासशील देशों से उत्सर्जन कम करने की अपेक्षा तभी सार्थक होगी जब उन्हें पर्याप्त वित्तीय सहायता और तकनीकी मदद मिले. यह एक ऐसा संदेश है, जो अमीर और गरीब राष्ट्रों के बीच की खाई पाटने में निर्णायक हो सकता है. दरअसल,
जी – 20 में भारत का यह दृष्टिकोण विश्वगुरु बनने की किसी दंभी घोषणा का हिस्सा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार शक्ति की शांत, आत्मविश्वासी और व्यावहारिक अभिव्यक्ति
है. भारत ने यह दिखाया है कि वैश्विक चुनौतियों,महामारी, कौशल संकट, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन का समाधान अलगाव या प्रतिस्पर्धा में नहीं, बल्कि सहयोग, साझा तकनीक और समान अवसरों में है. भारत का जी 20 एजेंडा यह स्पष्ट करता है कि भविष्य की दुनिया वही होगी जो सबसे कमजोर की आवाज़ सुनेगी. और इस नई वैश्विक व्यवस्था में भारत केवल एक सदस्य नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक भूमिका में दिखाई दे रहा है. जी 20 में मोदी की दृष्टि भारत की बढ़ती वैश्विक विश्वसनीयता, परिपक्वता और नेतृत्व शक्ति का प्रतीक है,एक ऐसा नेतृत्व जो दुनिया को विभाजित नहीं, बल्कि जोडऩे में विश्वास रखता है.
