बीसीआई ने दिल्ली हाईकोर्ट से कहा कि विदेशी वकीलों के नियमों को मंजूरी की आवश्यकता नहीं

नयी दिल्ली, 18 नवंबर (वार्ता) बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने मंगलवार को दिल्ली उच्च न्यायालय को सूचित किया कि भारत में विदेशी कानूनी फर्मों और वकीलों के प्रवेश एवं विनियमन की अनुमति देने वाले उसके 2022 के नियमों के लिए उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या केंद्र सरकार की पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की खंडपीठ के समक्ष डेंटन्स लिंक लीगल एवं सीएमएस इंडस लॉ द्वारा दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान यह जानकारी दी गयी। इनकी याचिका में भारत में विदेशी वकीलों एवं विदेशी कानून फर्मों के पंजीकरण एवं विनियमन के लिए बीसीआई के नियम, 2022 को चुनौती दी गयी थी।
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद निगम ने तर्क दिया कि बीसीआई ने यह नहीं बताया है कि उसने इन नियमों को तैयार करने से पहले मुख्य न्यायाधीश या केंद्र सरकार की मंजूरी प्राप्त की थी। इसके जवाब मेंं बीसीआई के वकील ने कहा, “हमें जवाब दाखिल करने के लिए मंजूरी की आवश्यकता नहीं है और हम इसका औचित्य सिद्ध करेंगे।”
सुनवाई के दौरान पीठ ने बीसीआई नियमों, विशेषकर केवल प्रारंभिक जांच के आधार पर विधि फर्मों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई के प्रावधानों के संबंध में अपनी पूर्व की आपत्तियों को दोहराया। न्यायालय ने कहा, “यह अव्यवस्था है। आप (बीसीआई) इसमें संशोधन क्यों नहीं करते? ये नियम पूरे देश में लागू हैं।” बीसीआई ने दलील दी कि परामर्श प्रक्रिया चल रही है और सुझावों पर विचार किया जा रहा है। इस पर खंडपीठ ने कहा, “कृपया यह सब समझाने के बदले आप नियमों को उचित तरीके से बनाएं। आख़िरकार आप बार काउंसिल हैं।”
न्यायालय ने बीसीआई को अपना हलफनामा दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया और मामले को जनवरी तक के लिए स्थगित कर दिया। इसके साथ ही उच्च न्यायालय का पूर्व आदेश जारी रहेगा जो बीसीआई को याचिकाकर्ता लॉ फर्मों के खिलाफ कोई अंतिम निर्णय पर प्रतिबंध लगाता है । खंडपीठ ने निर्देश दिया, “अंतिम निर्णय मत लें।”
गौरतलब है कि बीसीआई ने अगस्त 2025 डेंटन्स लिंक लीगल और इंडसलॉ को भारतीय एवं विदेशी कानूनी फर्मों के बीच कथित अनधिकृत सहयोग के बारे में कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए 2022 के नियमों का उल्लंघन बताया था।इसके बाद डेंटन्स लिंक लीगल और इंडसलॉ ने उच्च न्यायालय में यह याचिका दायर की थी।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि बीसीआई के पास अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत विदेशी कानूनी फर्मों और वकीलों के प्रवेश को विनियमित करने के लिए नियम बनाने की कोई शक्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि ये नियम अधिवक्ता अधिनियम के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं और संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(जी) और 21 का उल्लंघन करते हैं। अधिवक्ता अधिनियम की धारा 49 बीसीआई को ऐसे नियम बनाने का अधिकार नहीं देती है।
डेंटन्स लिंक लीगल ने तर्क दिया कि धारा 49(1) (सी) और (ई) के लिए मुख्य न्यायाधीश या केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता होती है जो बीसीआई ने प्राप्त नहीं की है। उनका तर्क है कि ये विनियमन केवल विदेशी कानूनी फर्मों से संबंधित हैं लेकिन इनमें भारतीय कानूनी फर्मों को परिभाषित नहीं किया गया है जिससे नियामक असंगतता उत्पन्न होती है।
उच्च न्यायालय ने पहले भी इसी तरह की चिंता व्यक्त की थी और उन प्रावधानों पर सवाल खड़ा किया था जो केवल प्रारंभिक निष्कर्षों के आधार पर कानूनी फर्मों के खिलाफ गंभीर कार्रवाई की अनुमति देते हैं। इस मामले की अगली सुनवाई जनवरी में होगी।

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