मंडला:ग्राम लावर के प्रगतिशील किसान धर्मराज सिंह ने “जहां चाह, वहां राह” कहावत को साकार कर दिखाया है। मक्के की परंपरागत खेती से हटकर उन्होंने हल्दी की फसल अपनाई और आज अपनी मेहनत, नवाचार और नई सोच की बदौलत आत्मनिर्भर किसान का उदाहरण बन गए हैं।धर्मराज सिंह को वर्ष 2017 में उद्यानिकी विभाग की हल्दी प्रदर्शन योजना के तहत कर्नाटक हल्दी के 250 किलोग्राम बीज और तकनीकी प्रशिक्षण मिला।
उन्होंने 1.5 एकड़ भूमि पर प्रयोग के तौर पर हल्दी की खेती शुरू की। पहले ही वर्ष में बेहतर उत्पादन प्राप्त हुआ और तभी से वे हर वर्ष निरंतर हल्दी की सफल फसल ले रहे हैं।धर्मराज सिंह बताते हैं कि विभागीय मार्गदर्शन से खेती में नया रास्ता मिला है। अब हल्दी की खेती से उन्हें स्थायी आमदनी का स्रोत मिल चुका है।फलों और हल्दी की जोड़ी बनी लाभदायककृषक ने खेत में आम और नींबू के पौधे लगाए हैं, जिससे हल्दी को आवश्यक छाया मिलती है और साथ ही फलों की बिक्री से अतिरिक्त आय होती है।
इससे उनकी खेती दोहरे लाभ का माध्यम बन गई है। जैविक हल्दी की बढ़ी पहचान धर्मराज सिंह पूरी तरह जैविक पद्धति अपनाते हैं। वे केवल गोबर खाद का उपयोग करते हैं और रासायनिक उर्वरकों से दूरी बनाए रखते हैं। उनकी जैविक हल्दी को जबलपुर सहित आसपास के बाजारों में अच्छी मांग मिल रही है। उन्हें प्रति किलोग्राम 90 से 95 रुपये तक का मूल्य प्राप्त हो रहा है।
1.5 एकड़ भूमि से वे हर साल 15 से 18 क्विंटल तक उत्पादन कर आत्मनिर्भर जीवन यापन कर रहे हैं।नई तकनीक ने दी नई राह धर्मराज सिंह का मानना है कि यदि किसान शासन की योजनाओं का सही उपयोग करें और आधुनिक तकनीक अपनाएं, तो सीमित भूमि पर भी आत्मनिर्भरता संभव है। उनका यह प्रयास ग्राम लावर ही नहीं, बल्कि पूरे जिले के किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकता है।
