
नीमच। चाय प्रेमियों के बीच कागज के कप में चाय पीने का चलन तेजी से बढ़ा है, लेकिन हालिया रिसर्च ने इसके गंभीर दुष्परिणामों की ओर इशारा किया है। आईआईटी खड़गपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग की एक टीम ने अध्ययन में पाया कि पेपर कप के अंदर तरल पदार्थ को लीक होने से रोकने के लिए हाइड्रोफोबिक फिल्म की कोटिंग की जाती है, जो पॉलीइथिलीन या अन्य को-पॉलिमर से बनी होती है। गर्म चाय या पानी के संपर्क में आने पर यह कोटिंग टूटकर सूक्ष्म प्लास्टिक कणों में बदल जाती है, जो चाय में घुल जाते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, एक कप चाय में लगभग 25 हजार माइक्रोप्लास्टिक कण मिल जाते हैं। दिन में तीन बार कागज के कप में चाय पीने से व्यक्ति अनजाने में लगभग 75 हजार माइक्रोप्लास्टिक कण निगल जाता है। ये कण शरीर की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर कैंसर, हार्मोनल असंतुलन और नर्वस सिस्टम संबंधी बीमारियों का कारण बन सकते हैं।
इसी आधार पर नीमच की सामाजिक संस्था हेल्पिंग हैंड्स ने लोगों से अपील की है कि वे कागज के कप की जगह स्टील, चीनी मिट्टी, कांच के गिलास या पारंपरिक कुल्हड़ का उपयोग करें। संस्था के सदस्यों का कहना है कि पेपर कप की प्लास्टिक कोटिंग और रासायनिक तत्व न केवल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, बल्कि पर्यावरण प्रदूषण को भी बढ़ा रहे हैं।
