इंदौर: इंदौर और देवास वन मंडलों में बीते कुछ वर्षों के दौरान जंगलों में आग के संकेतों (फायर पॉइंट्स) की संख्या बढ़ी है, लेकिन इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि जंगलों को अधिक नुकसान हुआ हो. वन विभाग और विशेषज्ञों के मुताबिक यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से आधुनिक और अधिक संवेदनशील उपग्रह तकनीक के कारण दर्ज हो रही है, जबकि जमीनी स्तर पर बड़े पैमाने पर आग से होने वाला नुकसान सीमित ही रहा है.
वन विभाग के अनुसार फायर पॉइंट्स वह संकेत होते हैं, जिन्हें उपग्रह जंगल क्षेत्र में ऊष्मा के रूप में दर्ज करते हैं. यह आंकड़े सीधे तौर पर यह नहीं बताते कि कितने क्षेत्र में जंगल जला है. पहले उपयोग में रहे मोडिज उपग्रहों की तुलना में अब एसएनपीपी और वीआईआईआरएस जैसे आधुनिक उपग्रह बहुत छोटी, अल्पकालिक और सतही आग को भी पकड़ लेते हैं, जिससे आंकड़ों में स्वाभाविक बढ़ोतरी दिखाई देती है.
इसी निगरानी को और प्रभावी बनाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर विकसित ई-फॉरेस्ट फायर मॉडल को लागू किया है. यह मॉडल केवल आग लगने की सूचना ही नहीं देता, बल्कि पुराने आंकड़ों के आधार पर उन इलाकों की पहचान भी करता है, जहां बार-बार आग लगने की आशंका रहती है. इसके जरिए फायर सीजन शुरू होने से पहले ही तैयारी और रणनीतिक कदम उठाए जा रहे हैं. इंदौर और देवास वन मंडलों में इस डेटा-आधारित प्रणाली का लाभ साफ दिखाई दिया है.
आग के फैलाव को प्रभावी ढंग से रोका गया
इंदौर वन मंडल में फायर पॉइंट्स की संख्या बढ़ने के बावजूद बड़े पैमाने पर जले हुए क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय इजाफा नहीं हुआ. वहीं देवास में भी संवेदनशील इलाकों पर पहले से ध्यान देकर आग के फैलाव को प्रभावी ढंग से रोका गया. वन विशेषज्ञों का कहना है कि मध्य भारत में जंगलों में लगने वाली अधिकांश आग केवल जलवायु परिवर्तन का नतीजा नहीं होती. महुआ संग्रह, तेंदूपत्ता तोड़ाई, खेतों की सफाई और अन्य मानवीय गतिविधियों के कारण भी सतही आग लगती है. इसी वजह से अग्नि प्रबंधन की रणनीति स्थानीय परिस्थितियों और मानवीय गतिविधियों को ध्यान में रखकर बनाई जाती है.
आधुनिक तकनीक से आग के नुकसान को किया सीमित
इंदौर और देवास का अनुभव यह बताता है कि जंगलों में आग की घटनाओं को पूरी तरह खत्म करना भले संभव न हो, लेकिन वैज्ञानिक निगरानी, समय पर सूचना और तुरंत कार्रवाई से इसके प्रभाव को सीमित रखा जा सकता है. वन विभाग का मानना है कि अग्नि प्रबंधन की सफलता का पैमाना केवल आंकड़ों की संख्या नहीं, बल्कि आग का शीघ्र पता लगाना और मौके पर प्रभावी नियंत्रण करना है. इस संबंध में इंदौर के डीएफओ प्रदीप मिश्रा ने बताया कि आधुनिक तकनीक और जमीनी टीमों के समन्वय से जंगलों की संरचना और जैव विविधता को बड़े नुकसान से बचाया जा सका है.
