बुंदेलखंड की महिलाएं टेराकोटा कला से गढ़ रहीं आत्मनिर्भरता की मिसाल

छतरपुर। मिट्टी की खुशबू से आत्मनिर्भरता की कहानी लिख रहीं बुंदेलखंड की महिलाएं आज देश ही नहीं विदेशों में भी अपनी पहचान बना रही हैं। गांव की महिलाएं टेराकोटा कला के जरिये आकर्षक खिलौने, बर्तन और सजावटी सामान तैयार कर रही हैं। यह सदियों पुरानी बुंदेलखंड की पारंपरिक कला अब इन महिलाओं के हाथों से फिर से जीवंत हो उठी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करते हुए ये महिलाएं अपनी आजीविका खुद चला रही हैं।

मंत्री और कलेक्टर भी बने ग्राहक

मध्य प्रदेश स्थापना दिवस के मौके पर छतरपुर में आयोजित प्रदर्शनी में जब राज्य के वन एवं पर्यावरण मंत्री दिलीप अहिरवार और जिला कलेक्टर पार्थ जायसवाल पहुंचे तो ग्रामीण महिलाओं द्वारा लगाए गए मिट्टी के उत्पादों के स्टॉल देखकर खुद को रोक नहीं पाए। उन्होंने महिलाओं से खरीदारी की और उनकी कला की सराहना करते हुए कहा कि “ऐसी पारंपरिक कलाएं हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं, इन्हें सहेजना जरूरी है।”

पारंपरिक और सांस्कृतिक धरोहर बनी टेराकोटा कला

छतरपुर की टेराकोटा कला पारंपरिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखती है। प्रजापति समाज की महिलाएं इस कला को पीढ़ियों से जीवित रखे हुए हैं। चंदनगर और आसपास के गांवों में महिलाएं टेराकोटा से देवी-देवताओं की मूर्तियां, पारंपरिक दीपक, दीवार सजावट और अन्य घरेलू वस्तुएं तैयार करती हैं। इस मिट्टी के उत्पादों की देश-विदेश में भारी मांग है।

लोकल फॉर वोकल को मिल रहा बढ़ावा

कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने बताया कि “राजनगर विकासखंड के कई गांवों में महिला स्व-सहायता समूह टेराकोटा प्रोडक्ट्स बना रहे हैं। शासन की वित्तीय सहायता से अब मशीनें भी मिल चुकी हैं, जिससे उत्पादन बढ़ा है और महिलाओं को आर्थिक मजबूती मिल रही है।”

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