भारत की रक्षा नीति अब प्रतिक्रियात्मक नहीं रही, वह दूरदर्शी, आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अग्रसर है. हाल ही में रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) द्वारा लगभग 79 हजार करोड़ रुपये के रक्षा सौदों को मंजूरी देना इस परिवर्तनशील सोच का स्पष्ट संकेत है. यह निर्णय न केवल सीमाओं की सुरक्षा को मजबूती प्रदान करेगा बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ को रक्षा क्षेत्र में निर्णायक बल देगा. इन मंजूर परियोजनाओं में मिसाइल प्रणालियां, नौसेना की सतह तोपें, हाई-मोबिलिटी युद्ध वाहन और अत्याधुनिक संचार प्रणालियां शामिल हैं. इससे तीनों सेनाओं की तकनीकी और परिचालन क्षमता में वृद्धि होगी. यह कदम दर्शाता है कि भारत अब केवल सीमाओं की निगरानी करने वाला राष्ट्र नहीं, बल्कि बदलते सुरक्षा परिदृश्य के अनुरूप रणनीति गढऩे वाला देश बन गया है. चीन और पाकिस्तान के साथ जारी सीमा तनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य का युद्ध केवल मानवबल नहीं, बल्कि तकनीकी श्रेष्ठता और त्वरित निर्णय क्षमता से जीता जाएगा.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की यह घोषणा कि सभी खरीदों में ‘मेक इन इंडिया’ को प्राथमिकता दी जाएगी, भारतीय रक्षा उत्पादन के स्वदेशीकरण की दिशा में मील का पत्थर है. आज भारत ब्रह्मोस, पिनाका, नाग और तेजस जैसे प्रणालियों से लेकर युद्धपोत और हेलीकॉप्टर तक का उत्पादन घरेलू स्तर पर कर रहा है. डीआरडीओ के 100 से अधिक सफल प्रोजेक्ट 2025 तक इसी आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक उपलब्धि हैं. यह स्थिति देश को आयातक से निर्यातक के रूप में उभरने की दिशा में अग्रसर करती है.
रक्षा बजट की संरचना में भी यह आत्मविश्वास झलकता है. वर्ष 2025-26 के लिए 6.81 लाख करोड़ रुपये के रक्षा बजट में 1.72 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत व्यय के तौर पर रखे गए हैं. इसका स्पष्ट अर्थ है कि सरकार केवल संचालन और पेंशन पर नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक, अनुसंधान और उत्पादन पर निवेश कर रही है. विशेष रूप से 75 प्रतिशत रक्षा खरीद का घरेलू स्रोतों से होना विदेशी निर्भरता को कम करने और रोजगार सृजन को बढ़ाने वाला प्रभावी कदम है.
भारत की तीनों सेनाओं की संयुक्त ताकत निस्संदेह प्रभावशाली है. 14.6 लाख सक्रिय सैनिक, हजारों टैंक और सैकड़ों विमान व नौसेना पोतों के साथ भारत विश्व की सबसे बड़ी सैन्य शक्तियों में शुमार है. लेकिन आधुनिक युग में केवल संख्या नहीं, बल्कि तकनीकी प्रगति ही निर्णायक होती है. ड्रोन, साइबर-युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अंतरिक्ष सुरक्षा प्रणाली जैसे क्षेत्रों में भारत का निवेश एक दूरगामी दृष्टिकोण का प्रतीक है. यह दिखाता है कि देश अब 21वीं सदी के तकनीकी युद्धक्षेत्र के लिए स्वयं को तैयार कर रहा है.रक्षा अधिग्रहण परिषद की हालिया मंजूरी केवल सैन्य सौदों का संकलन नहीं, बल्कि भारत की सामरिक स्वायत्तता की नई परिभाषा है. इससे यह भी स्पष्ट है कि भारत अब सीमित संघर्ष की नहीं, बल्कि व्यापक सुरक्षा और शक्ति संतुलन की रणनीति को अपना रहा है, चाहे वह समुद्र हो, आकाश हो, या डिजिटल स्पेस.कुल मिलाकर भारत की रक्षा तैयारियां अब केवल खतरे का उत्तर देने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं को आकार देने के लिए हैं. आत्मनिर्भर, सक्षम और संसाधन-संपन्न भारत अब सुरक्षा का उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता और संरक्षक दोनों है. यही रूपांतरण उस आत्मविश्वास का प्रतीक है जो भारत को न केवल सीमाओं की रक्षा करने वाला राष्ट्र, बल्कि वैश्विक स्थिरता का स्तंभ बनने की राह पर अग्रसर करता है.
