
सिलवानी। आदिवासी अंचल के ग्राम पंचायत प्रतापगढ़ में शुक्रवार से पारंपरिक मढ़ई मेले की शुरुआत हो रही है। दीपावली के बाद हर साल लगने वाला यह मेला सौ वर्ष पुरानी परंपरा का जीवंत प्रतीक है, जो आज भी उसी उल्लास और भव्यता के साथ मनाया जाता है जैसे पहले हुआ करता था।
देवताओं के मिलन और खुशहाली का पर्व
मढ़ई मेले को आदिवासी समाज देवताओं के मिलन का पर्व मानता है। यह आयोजन तब होता है जब खेती-किसानी का काम पूरा हो जाता है और नई फसल की तैयारी शुरू होती है। ग्रामीण इसे समृद्धि और सुख-शांति का प्रतीक मानते हैं। पारंपरिक परिधान पहनकर ग्रामीण ढोल, मादल, टिमकी और थाली की थाप पर लोकनृत्य करते हैं। नृत्य की शुरुआत गांव के बुजुर्गों की अनुमति से होती है, जो आदिवासी रीति-रिवाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सामूहिकता और लोक उत्सव की झलक
यह मेला सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, प्रेम और सहयोग की भावना का भी प्रतीक है। देवी-देवताओं की पूजा के साथ शुरू होकर यह उत्सव कई हफ्तों तक चलता है, जिसमें आसपास के गांवों से हजारों लोग शामिल होते हैं। इस दौरान पूरे अंचल में आदिवासी गीतों और लोकनृत्यों की गूंज सुनाई देती है।
राजनीतिक और सामाजिक उपस्थिति का केंद्र
प्रतापगढ़ का मढ़ई मेला सिलवानी क्षेत्र का सबसे चर्चित आयोजन माना जाता है। इसमें न केवल स्थानीय ग्रामीण, बल्कि क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि और नेता भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। श्रद्धालुओं और दर्शकों की भीड़ इस आयोजन को लोकजीवन की जड़ों से जुड़ी परंपरा का महोत्सव बना देती है।
संस्कृति का जीवंत दस्तावेज
मढ़ई मेला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, आस्था और परंपरा का संरक्षण है। यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों के लिए लोकसंस्कृति का अमूल्य दस्तावेज बन चुका है, जो यह बताता है कि बदलते समय में भी परंपराएं जीवित हैं और समाज को जोड़ने का कार्य कर रही हैं।
