सतना :राज्य के छिंदवाड़ा जिले में कफ सीरप पीने के कारण अब तक 21 मासूम असमय काल के गाल में समा चुके हैं. जिसे देखते हुए राज्य भर में अमानक दवाओं की बिक्री पर कड़ी निगरानी भी की जा रही है. लेकिन आलम यह है कि एक ओर जहां सतना सहित विंध्य क्षेत्र में नशे के तौर पर इस्तेमाल होने वाली कफ सीरप और अन्य दवाओं की पहुंच पान की दुकानों तक हो चुकी है. वहीं दूसरी ओर इस इस तरह के गंभीर मामलों में औषधि निरीक्षक की भूमिका महज मौन दृष्टा के तौर पर देखी जा रही है.
सतना सहित विंध्य क्षेत्र में शायद ही ऐसा कोई दिन होता हो जब कहीं न कहीं पुलिस द्वारा नशे में इस्तेमाल होने वाली दवाओं को न पकड़ा जाता हो.
नशीली दवाओं की तस्करी कर रहे लोगों के साथ-साथ घटना में प्रयुक्त लक्जरी चार पहिया वाहनों के साथ-साथ आटो व दो पहिया वाहनों तक को पुलिस द्वारा पकड़ा जाता है. आलम यह है कि नशीली दवाओं की पहुंच कुछ ढाबों, किराना दुकान और यहां तक की पानी की दुकानों तक हो चुकी है. जहां से नशे में इस्तेमाल होने वाली कफ सीरप टेबलेट्स और कैप्स्यूल बड़ी ही आसानी से खरीदे जा सकते हैं. हलांकि पुलिस द्वारा सूचना मिलने के आधार पर समय समय पर कार्रवाई की जाती है. लेकिन इस मामले में औषधि निरीक्षक प्रियंका चौबे की भूमिका पूरी तरह मौन नजर आती है.
दरअसल किसी भी दवा कंपनी में दवा का उत्पादन होने के बाद से लेकर उपभोक्ता तक पहुंचने के लिए उचित प्रक्रिया अपनाई जाती है. कंपनी में दवा बनने के बाद राज्य के सी एण्ड एफ के पास पहुंचती है. वहां से सुपर स्टॉकिस्ट और स्टॉकिस्ट से होते हुए फुटकर दवा विक्रेता तक पहुंचती है. जहां से चिकित्सक द्वारा लिखे गए पर्चे के अनुसार दवाएं ग्राहक को बेची जाती हैं. लेकिन ऐसा कैसे संभव हो पाता है कि उक्त सारी प्रक्रियायों को दरकिनार करते हुए नशे में इस्तेमाल होने वाली कफ सीरप, टेबलेट्स और कैप्स्यूल खुले आम बिकते हैं. जाहिर है कि इस तरह की गंभीर अनियमितताओं की जांच और निगरानी की जिम्मेदारी औषधि निरीक्षक की होती है. लेकिन इस मामले में अब तक औषधि निरीक्षक द्वारा की जाने वाली जांच कार्रवाई महज खानापूर्ति तक ही सीमित नजर आई है.
दवा संघ का दबदबा
छिंदवाड़ा में कफ सीरप से बच्चों की मौत के मामले में राज्य शासन के निर्देशों के चलते औषधि निरीक्षक द्वारा सक्रियता दिखाते हुए जांच शुरु की गई. लेकिन यह सक्रियता महज 3 दुकानों की औपचारिक जांच करने की खाना पूर्ति तक ही सीमित नजर आई. आलम है कि उमरिया जिले का प्रभार भी औषधि निरीक्षक प्रियंका चौबे के पास है. लेकिन पिछले दो साल में उन्होंने वहां कोई जांच नहीं की. छिंदवाड़ा मामला सामने आने पर वे अचानक उमरिया पहुंची. लेकिन वहां पर उनकी जांच कार्रवाई दवा संघ की आवभगत स्वीकराने और बंद कमरे में बैठक करने तक ही सीमित नजर आई. बताया गया कि दवा संघ की सलाह पर वहां की 3 दुकानों की जांच कर औपचारिकता निभा ली गई. लगभग इसी तरह की औपचारिक कार्रवाई सतना में भी दवा संघ की सलाह पर पूरी कर ली गई
