भारत के आत्मनिर्भरता की ओर दृढ़ कदम

भारत लंबे समय तक रक्षा उपकरणों और हथियारों के लिए आयात पर निर्भर रहा है. यह स्थिति न केवल रणनीतिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण थी बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार पर भी बोझ डालती थी. लेकिन पिछले एक दशक में तस्वीर बदलने लगी है. केंद्र सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को रक्षा क्षेत्र में प्राथमिकता दी है और उसके परिणाम अब ज़मीन पर दिखाई देने लगे हैं.

हाल ही में भारत ने ‘अनंत शस्त्र’ का सफल परीक्षण किया, जो स्वदेशी अनुसंधान और विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. यह परीक्षण इस बात का प्रतीक है कि भारतीय वैज्ञानिक और इंजीनियर अब उच्च तकनीक वाले हथियार प्रणालियों के निर्माण में पूरी तरह सक्षम हो रहे हैं. ‘अनंत शस्त्र’ का सफल प्रदर्शन केवल तकनीकी विजय नहीं बल्कि आत्मनिर्भरता के संकल्प की ठोस झलक भी है.

रक्षा उत्पादन को गति देने के लिए सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर’ जैसी योजनाओं की शुरुआत की. उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में स्थापित कॉरिडोर अब धीरे-धीरे रक्षा उद्योग का केंद्र बन रहे हैं. छोटे और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) से लेकर बड़े औद्योगिक घरानों तक, सभी इस क्षेत्र में भागीदारी कर रहे हैं. निजी क्षेत्र की मौजूदगी ने पारंपरिक रक्षा उत्पादन मॉडल को नया आयाम दिया है. टाटा, एलएंडटी, महिंद्रा और अदानी जैसे समूह अब रक्षा उपकरण निर्माण और निर्यात में सक्रिय हो चुके हैं.

सरकारी कंपनियों का पुनर्गठन भी उल्लेखनीय है. हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड जैसे सार्वजनिक उपक्रम अब आधुनिक तकनीक के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उतर रहे हैं. ड्रोन, मिसाइल, तोप और हल्के टैंक जैसे उत्पादों का स्वदेशीकरण रक्षा निर्यात को नई ऊंचाई दे रहा है. आज भारत 85 से अधिक देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है और यह आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है.

सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट बताती है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा है. लेकिन अब परिदृश्य बदल रहा है. आयात पर निर्भरता घटाने और निर्यात बढ़ाने का लक्ष्य ‘डिफेंस एक्सपोट्र्स 2047 विजऩ’ के माध्यम से स्पष्ट किया गया है. हाल ही में अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय हथियारों की बढ़ती मांग इसी दिशा का संकेत है.

फिर भी चुनौतियाँ मौजूद हैं. अनुसंधान एवं विकास पर पर्याप्त निवेश, तकनीकी हस्तांतरण की सीमाएँ, और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी बाधाएँ सामने आती हैं. इसके बावजूद, यदि नीति निर्धारण और क्रियान्वयन में निरंतरता बनी रही तो भारत अगले दो दशकों में रक्षा उत्पादन का वैश्विक केंद्र बन सकता है.

‘अनंत शस्त्र’ जैसे सफल परीक्षण हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि आत्मनिर्भर भारत का सपना केवल नारा नहीं, बल्कि वास्तविकता में बदल रहा है. स्वदेशी रक्षा उत्पादन न केवल भारत की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा बल्कि उसे वैश्विक हथियार बाज़ार में भी सशक्त बनाएगा.

 

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