नेवर जज बुक ऑफ इट्स कवर!

क्या सशक्त होती महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता का स्तर समाज में घटा है?

समाज में महिलाओं की प्रति मिश्रित बदलाव आए हैं। यह तो निश्चित है आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिला ही सशक्तता का दावा पेश करती हैं। पर इसमें भी तो संशय है की आर्थिक रूप से सशक्त महिला क्या सच में सशक्त है?
यह विषय गहन है और शुद्ध हवा में आग के गोले की तरह है जो गाहे बगाहे गहरी तपन देता है।
बहुत सोचा लिखने के लिए, तब महसूस हुआ कि मैंने यदि अपने अकेले के विचार लिखें तो विषय के साथ न्याय नहीं हो पाएगा।तब मैंने कुछ आर्थिक रूप से सशक्त महिलाओं से बात की ।

 

सर्वप्रथम मैंने 75 वर्षीय वृद्धा जिसे मैं सब्जियां बेचते विगत 35 वर्ष से देख रही हूं। सिर पर टोकरा रखकर सब्जी…की आवाज लगाते चौखट पर खड़ी हो जाती हैं। अब तो उनका टोकरा रखना भी पड़ता है, उतारना भी पड़ता है। गौर वर्ण,भाल पर कंकू की बड़ी-सी बिंदिया, साफ सुथरी बेहद आकर्षक।
अब उनके पैर तिरछे हो गए हैं। घुटने में भी तकलीफ है।
मैंने उनसे बहुत सोच समझ कर पूछा की अम्मा आप इतने दिनों से सब्जी बेचती हो। क्या कभी कोई आप को कुछ कहता नहीं है? लोग कुछ तो बोलते होंगे। कहने लगी- लोगहोन तो बोलते हैं। पर बेटा मैं उनका सुनती तो बच्चे कैसे पालती? तेरे दादा तो शुरू से बीमार रहते हैं। उनका क्या किसी औरत की मजबूरी कोई क्या समझता है? आगे बोलीं- मैंने बेटा पहले भी ध्यान नहीं दिया,अभी भी ध्यान नहीं देती हूं। इसे कहते हैं शायद मानसिक सशक्तता।
एक अन्य सब्जी विक्रेता हैं। वह यंग हैं पर विधवा हैं। दो छोटे बच्चे सब्जी के ठेले पर ही साथ लाती हैं। उनसे जब पूछा कि आपका सब्जी बेचना या बाहर काम करने का अनुभव कैसा है?
वह अत्यंत दुखी हो गईं और कहने लगीं- बहुत खराब है आदमी जात। अब मेरे पास सब्जी लेने वाले पुरुष ज्यादा आते हैं! वह सब्जी तोलने से लेकर पैसे देने तक किसी न किसी बहाने छूना चाहते हैं।
उनकी बात सुनकर मन विव्हल जरूर हुआ पर उनकी दृढ़ता के आगे मन झुक गया।

शासकीय कार्यालय में क्लर्क हैं। कई किलोमीटर दूर से आती हैं चाहे कैसा भी मौसम हो,चाहे कितनी भी तबीयत खराब हो। पर जब भी तबादलों का मौसम आता है वह बड़ी आशा से आवेदन देती हैं। उन्हें बड़े अधिकारी बुलाते हैं और यही कहते हैं कि घर के पास तो ट्रांसफर मुश्किल है। इतनी सुविधा चाहिए तो नौकरी छोड़ दो। वह एक खुद्दार महिला है। अपने अधिकार का उपयोग करते हुए ही वह बार-बार आवेदन देती है और अधिकारी के कहे गए वाक्यांश का भी गुढ़ अर्थ जानती है। आर्थिक सशक्तता के साथ अकेली महिला को तो पुरुष हमेशा उपलब्ध के रूप में मानते हैं और साथ ही सहकर्मी महिलाएं भी हमेशा उपेक्षित नजरों से देखती हैं। उनकी उपलब्धियां को भी शक के दायरे में रखती हैं। सहकर्मी के रूप में महिला हो या पुरुष उनके बारे में जितनी जानकारी जुटा सकते हैं जुटाते हैं। झूठी सहानुभूति को अपनी वाक् पटुता से समानुभूति बताने में भी परहेज नहीं करते। वह संभ्रांत बड़े पद पर कार्यरत महिला कहती है कि अब मैं पुरुष की लालायित नजर भाँप जाती हूँ।

कुछ घरेलू काम वाली बाइयों के भी विचार जानने की कोशिश की। वह कहती हैं कि घर से निकलते ही आसपास की महिलाएं यही ताना मारती हैं की क्या पता कहां जा रही है? इस तरह की बातें जब कानों में पड़ती हैं तो मन बहुत आहत हो जाता है।
जमाने की निगाहों से बचने के लिए विधवा, परित्यक्ता महिलाओं को भी गले में मंगलसूत्र सुरक्षा कवच के रूप में लटकाए देखा है।
आर्थिक रूप से सामाजिक रूप से सशक्त कई ऐसी महिलाओं को भी देखा है जो परिवार को आर्थिक संपन्नता देती हैं किंतु जब उनकी शादी की बात चलती है तो उनके माता-पिता, भाई सभी घोर विरोधी हो जाते हैं। उन्हें उनकी व्यक्तिगत जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं होता।

कितना दुखद पहलू है,परिवार को दी हुई आर्थिक संपन्नता ही उसकी निजी जिंदगी में दुःख का कारण बन गई। जब महिला ने चाहा या कहें ठाना कि वह किसी पर बोझ नहीं बनेगी तो समाज लगातार उसके प्रति कठोर होता गया। जो महिला सराहना के काबिल है उसके प्रति समाज में संवेदना का स्तर शून्य हो गया।
महिलाओं के बारे में जानकर एक बात तो निश्चित ही उभर कर आई है की मानसिक सशक्तता ही आर्थिक रूप से सशक्त स्वावलंबन की जननी है! महिलाएं अगर बाहर निकल रही हैं तो उन्हें अपनी सीमा तो तय करनी होती है। उन्हें बेड़ियों को तोड़ना है, हिम्मत जुटाना है, हर तरह की हिंसा से दूर होना है ,अपने पर हो रहे अत्याचार की भी सीमा तय करना है तो उन्हें दृढ़ निश्चय के साथ निकलना होगा। उन्हें अपने स्त्रीयोचित गुण को साथ रखना होगा। समाज में रहकर भी समाज को तुम्हें एक सीमा में बांधना है। उन्हें यह अधिकार नहीं देना है कि वह तुम्हें जज करें।
समाज को स्वयं यह समझना होगा की नेवर जज बुक ऑफ इट्स कवर!

विनीता तिवारी 

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