शीर्ष का शाद्धिक अर्थ है सर्वोच्च अर्थात सिर, इसीलिए सिर के बल किये जाने वाले इस आसन को “शीर्षासन” कहा जाता है।

शीर्षासन की विधिः- दोनों हाथों की अँगलियों को आपस में बाँधकर कोहनी तक हाथ
फैलाकर भूमि पर टिकादें। दोनों हाथों के बीच जो रिक्त स्थान बनेगा वहाँ पर गोल गद्दी या कपड़ा रखें अब सिर का कपाल वाला हिसा गद्दी पर रखें। घुटने, पंजे भूमि पर टिके रहेगें। शरीर का भार अब धीरे-धीरे गर्दन व कोहनियों पर संतुलित करते हुवे घुटने व पंजे कमर की सीध में लायें और कमर को सिर के लबंवत् करें। इसके पश्चात पैरो को धीरे-धीरे ऊपर खोलकर गर्दन कमर के लंबवत फैलाएँ। प्रारम्भ में आखों को खुला रखें। अभ्यास होने के बाद आखों को बन्द कर सकते है। श्वांस प्रश्वांस की गति को सामान्य रखें। यह शीर्षासन की पूर्ण स्थिति हुई । यथासंभव रूकने के पश्चात जिस क्रम से पेर ऊपर ले गये थे, उसी क्रम से पैरो को निचे की और पुर्व स्थिति में लाना है। शीर्षास करने के पश्चात श्वांसन में लेट जाएँ, जिससे रक्त का प्रवाह सामान्य हो जावे।
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लाभः– शीर्षासन करने से मस्तिष्क को अधिक रक्त मिलता है। जिससे मस्तिष्क के सूक्ष्म तंतु, सेल आदि पर्याप्त मात्रा पोषण प्राप्त करते है। एवं आंख, कान, नाक, व सम्पूर्ण चेहरे को आरोग्यता मिलती है यह आसन सभी आसनो का राजा है। पिट्युटरी, प्रीनियल ग्लैंड्स सक्रिय होकर सम्पूर्ण मस्तिष्क को सक्रिय कर, स्मृति, मेधा, व धारणा शक्ति का विकास करता है।
पाचन तंत्र, अमाशय, आंत एवं यकृत को सक्रिय कर जग्राग्नि को प्रदीप्त करता है। आन्जवृद्धि, हार्निया अंण्कोष वुद्धि, कब्ज, व्हेरिकोज वेन्स आदि रोगों को दूर करता है। थायराइड, ग्लैन्ड को सक्रिय करता, स्वप्नदोष, प्रमेह, बंध्यापन, नपुंसकता आदि धातु संबंधि न्ययधियों को दूर कर ब्रम्हचर्य को स्थिर करता है। मुख मंडल पर ओज व तेज की वृद्धि करता है।
साबधानियाँः– जिनको मस्तिष्क से संबंधि विकार थोंबोसिस, निर्बलता व उष्णता एवं नेत्र सदा लाल रहते हो, उन्माद, निद्रानाश, ऊर्ध्वरक्त-पित्त, तीक्ष्ण श्वास रोग, तीव्र हृदय गति, क्षय, नवज्वर, जार्ण कोष्ठवद्धता, नेत्र के स्नायुमंडल की अधिक दुर्बलता, कान का बहना, जुकाम या नजला वाले रोगियों को शीर्षासन नही करना चाहिए। कठोर व्यायाम के बाद शीर्षासन नही करना चाहिये। भोजन के पश्चात व रात्रि को शीर्षासन वर्जित है। उच्यरक्त चाप एवं हृदय रोगी इस आसनको न करें।

योगाचार्य रामनरेश रघुवंशी
