पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध की आंच में तप रहा है. अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है. ऐसे समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए संतुलित और जिम्मेदार कूटनीतिक भूमिका निभाए. राज्यसभा में विदेश मंत्री एस. जयशंकर का हालिया बयान इसी संतुलित दृष्टिकोण का स्पष्ट संकेत देता है.
भारत की नीति तीन स्पष्ट स्तंभों पर आधारित है,शांति और संवाद, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और राष्ट्रीय-ऊर्जा हितों की रक्षा. यह दृष्टिकोण केवल आदर्शवाद नहीं बल्कि व्यावहारिक कूटनीति का उदाहरण है. पश्चिम एशिया भारत के लिए केवल एक दूरस्थ भू-राजनीतिक क्षेत्र नहीं है. यह वह इलाका है जहां लगभग एक करोड़ भारतीय रहते और काम करते हैं, जहां से भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा प्राप्त करता है और जहां से वैश्विक व्यापारिक मार्ग गुजरते हैं.
इसलिए भारत के लिए इस संकट का मानवीय और आर्थिक दोनों पहलुओं से गहरा महत्व है. अब तक लगभग 67,000 भारतीयों की सुरक्षित वापसी यह दर्शाती है कि सरकार इस चुनौती को गंभीरता से ले रही है. विदेश मंत्रालय और दूतावासों की सक्रियता इस बात का प्रमाण है कि भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है.
ईरान को मानवीय आधार पर अपने युद्धपोत को भारतीय बंदरगाह पर डॉक करने की अनुमति देना भारत की परंपरागत कूटनीतिक शैली को भी दर्शाता है. भारत ने हमेशा कठिन परिस्थितियों में भी मानवीय मूल्यों और संतुलित संबंधों को महत्व दिया है. ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं, वहीं इजराइल और अमेरिका के साथ भी भारत की साझेदारी लगातार मजबूत हुई है. ऐसे में किसी एक पक्ष की ओर झुकाव दिखाने के बजाय संतुलन बनाए रखना ही भारत की वास्तविक शक्ति है.हालांकि इस संकट के व्यापक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. यदि यह युद्ध और फैलता है तो वैश्विक सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ सकता है. तेल की कीमतों में संभावित उछाल भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती बन सकता है. इसका सीधा प्रभाव महंगाई, परिवहन लागत और आम उपभोक्ता के जीवन पर पड़ेगा.समुद्री सुरक्षा भी एक गंभीर चिंता बनकर उभरी है. व्यापारिक जहाजों पर हमलों में भारतीय नाविकों की मौत और एक के लापता होने की खबर यह बताती है कि यह संकट केवल कूटनीतिक बहस तक सीमित नहीं है बल्कि इसके मानवीय और सुरक्षा आयाम भी बेहद गंभीर हैं. हिंद महासागर और अरब सागर के समुद्री मार्ग भारत के व्यापार के लिए जीवनरेखा हैं.
ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्थिति की प्रत्यक्ष निगरानी और सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक यह संकेत देती है कि भारत सरकार संभावित संकटों के लिए तैयार रहना चाहती है. समन्वित सरकारी तैयारी इस बात का संकेत है कि भारत केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं बल्कि सक्रिय रणनीति अपना रहा है.पश्चिम एशिया का यह संकट भारत के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा भी है. एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में भारत को न केवल अपने हितों की रक्षा करनी है बल्कि वैश्विक शांति के लिए रचनात्मक भूमिका भी निभानी है. जयशंकर का बयान इसी व्यापक दृष्टि को सामने लाता है कि भारत युद्ध का नहीं, संवाद का पक्षधर है. मौजूदा दौर की अस्थिर दुनिया में यही संतुलित कूटनीति भारत की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है. भारत की चुनौती यही है कि वह शांति की आवाज भी बना रहे और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा भी करता रहे.
