जबलपुर: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एमएम सुंदरेश व जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की युगलपीठ ने अपने एक अहम आदेश में मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता कार्यालय में शासकीय अधिवक्ताओं की टीम में आरक्षित वर्ग व महिलाओं को समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने कहा है। कोर्ट ने साफ किया है कि इस संबंध में वैधानिक प्रावधान उपलब्ध नहीं है, लेकिन महाधिवक्ता यह सुनिश्चित करें कि वंचित समुदाय और महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व मिले। इस मत के साथ सुप्रीम कोर्ट ने मप्र में सरकारी वकीलों की नियुक्ति में ओबीसी व अन्य आरक्षित वर्ग को आरक्षण देने की मांग वाली याचिका का अंतिम निराकरण कर दिया।
दरअसल, एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन जबलपुर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया गया था कि महाधिवक्ता कार्यालय में हालिया नियुक्तियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी वर्ग के अधिवक्ताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, वरुण ठाकुर व विनायक प्रसाद शाह ने दलील दी कि हाल की नियुक्तियों में एक भी एसटी अधिवक्ता का चयन नहीं हुआ और एससी वर्ग से भी बहुत कम अधिवक्ताओं को स्थान मिला। यह भी कहा गया कि सरकारी वकीलों की नियुक्ति का दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि ऐसे वकीलों पर आगे चलकर न्यायाधीश पद के लिए विचार किया जाता है।
इस पर जस्टिस सुंदरेश ने सवाल उठाया कि क्या ऐसी नियुक्तियों में आरक्षण को अधिकार के रूप में लागू किया जा सकता है। उन्होंने कहा, क्या हम विधि लिपिक के लिए भी आरक्षण दे सकते हैं, जो महाधिवक्ता अपनी टीम अपने साथ लाते हैं। न्यायमूर्ति कोटिश्वर सिंह ने यह भी कहा कि महाधिवक्ता बदलने पर अक्सर सरकारी वकील भी बदल जाते हैं। वहीं राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और अन्य अदालतों में राज्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए महाधिवक्ता को अपनी टीम नियुक्त करने का विशेषाधिकार है और इन नियुक्तियों पर वैधानिक आरक्षण नियम लागू नहीं होते।
