
मंडला। आदिवासी अंचलों की बस्तियाँ तेजी से खाली हो रही हैं। मंडला जिले से लेकर महाकौशल और विंध्य के आदिवासी बहुल इलाकों तक पलायन अब मौसमी नहीं रहा, बल्कि स्थायी हकीकत बन गया है। स्थिति यह है कि हर तीन परिवारों में से दो परिवार का सदस्य रोजगार की तलाश में गांव छोड़ चुका है।
सरकार की योजनाएँ कागज़ों पर सक्रिय हैं, पर जमीन पर न तो काम है और न मजदूरी। मनरेगा ठप पड़ी है, खेत सूखे हैं और ठेकेदारी व्यवस्था में स्थानीय मजदूरों को काम तक नहीं मिल रहा। बाहर से आए ठेकेदार अपने श्रमिक लगाकर काम निपटा रहे हैं। मजबूरन आदिवासी परिवार रोज़गार की तलाश में इंदौर, भोपाल, नागपुर, हैदराबाद और केरल तक का सफर कर रहे हैं।
मंडला के मवई, मोहगांव और निवास ब्लॉकों की तस्वीर चौंकाने वाली है। यहां 65 से 75 प्रतिशत परिवार अब गांव में नहीं, बल्कि पलायन की मजबूरी में शहरों में भटक रहे हैं। गांवों में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग ही शेष रह गए हैं।
सरकारी दावों के विपरीत हकीकत यह है कि मजदूरी का भुगतान महीनों तक अटका रहता है। काम की स्वीकृति में देरी और भ्रष्टाचार ने व्यवस्था को जकड़ लिया है। वहीं, 5 किलो मुफ्त राशन ने भूख तो कम की है लेकिन बेरोजगारी और पलायन जैसी मूल समस्याओं को नहीं रोक पाया।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सरकार पलायन रोकने को गंभीर है तो—
मनरेगा को पारदर्शी और समयबद्ध बनाया जाए,
औषधीय पौधों और लघु वनोपज आधारित उद्योगों को बढ़ावा मिले,
मोटे अनाज की खेती को प्रोत्साहन दिया जाए,
गांवों में प्रसंस्करण इकाइयाँ और लघु उद्योग स्थापित किए जाएं।
विडंबना यह है कि जिन जिलों से पलायन सबसे अधिक हो रहा है, वहां सांसद से लेकर विधायक, मंत्री, सरपंच और पंचायत प्रतिनिधि स्वयं आदिवासी समाज से हैं। बावजूद इसके, मंडला जैसे आदिवासी जिले आज भी विकास से कोसों दूर हैं। चुनावी मंचों पर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, मगर सच्चाई यह है कि गांव वीरान हो रहे हैं और लोग अपनी जड़ों से दूर जाने को मजबूर हैं।
