सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार अभिसार शर्मा को अंतरिम संरक्षण प्रदान किया

नयी दिल्ली, 28 अगस्त (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने यूट्यूब वीडियो में असम सरकार की आलोचना करने संबंधी मामले में पत्रकार अभिसार शर्मा को चार सप्ताह के लिए गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान किया है।

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने गुरूवार को राष्ट्र की संप्रभुता को कथित रूप से खतरे में डालने और अन्य अपराधों के लिए भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों के तहत उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने संबंधी याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए उन्हें गुवाहाटी उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया।

पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, “आप प्राथमिकी को उच्च न्यायालय में चुनौती दें। आप उच्च न्यायालय को क्यों दरकिनार कर रहे हैं? सिर्फ इसलिए कि आप एक पत्रकार हैं, हम आपको संरक्षण देंगे। आप उच्च न्यायालय जाएं।”

श्री शर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ कई प्राथमिकी दर्ज की जा सकती हैं और उन्होंने शीर्ष अदालत से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “समाज इस न्यायालय की ओर देखता है। कृपया ऐसा न करें। ऐसा नहीं होना चाहिए। हम क्या संदेश दे रहे हैं?”

शीर्ष न्यायालय ने प्राथमिकी रद्द करने की याचिका को खारिज करते हुए कहा, “जहां तक प्राथमिकी को चुनौती देने का सवाल है, हम हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं , हालांकि हम याचिकाकर्ता को चार सप्ताह की अवधि के लिए अंतरिम संरक्षण देने के इच्छुक हैं ताकि वह उच्च न्यायालय में अपना मामला रख सके।”

शीर्ष न्यायालय ने श्री शर्मा की ओर से भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 की संवैधानिक वैधता को अलग से चुनौती देने पर केंद्र को नोटिस जारी किया, जो राष्ट्र की संप्रभुता को खतरे में डालने के अपराध से संबंधित है। इस पहलू को न्यायालय में पहले से लंबित इसी तरह की याचिकाओं के साथ जोड़ा गया था।

गौरतलब है कि गत 21 अगस्त को श्री शर्मा के खिलाफ दर्ज की गयी प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 (संप्रभुता को खतरे में डालना), 196 (समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 197 (राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुँचाने वाले बयान) के तहत मामला दर्ज किया गया है। उन पर सरकार का उपहास करने , राम राज्य की अवधारणा का मजाक उड़ाने और 3,000 बीघा आदिवासी भूमि एक निजी संस्था को आवंटित करने के लिए राज्य की आलोचना करते हुए विभाजनकारी भावनाओं को बढ़ावा देने का आरोप है।

 

 

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