
मंडला।जिले में एक ओर जहां गोंडी पब्लिक ट्रस्ट सभागार में इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चर हेरिटेज द्वारा “मेंगो फेस्टिवल” का आयोजन धूमधाम से किया गया, वहीं दूसरी ओर मंडला के स्थानीय बाजारों में सड़े हुए और खतरनाक केमिकल से पकाए गए आम खुलेआम बिकते नजर आ रहे हैं।
इस आयोजन का शुभारंभ कलेक्टर श्री सोमेश मिश्रा एवं जिला पंचायत सीईओ श्री श्रेयांस कूमट द्वारा किया गया, लेकिन सवाल यह है कि इस मंच से मंडला के देसी आमों और स्थानीय उत्पादकों को पहचान क्यों नहीं मिल सकी?
मंडला जिले में आम की कई देसी किस्में जैसे दसीहरी, चौसा, बंबैया, लंगड़ा आदि पारंपरिक रूप से उगाई जाती रही हैं, जिनका स्वाद और खुशबू बाजार में मौजूद आमों से कहीं बेहतर है। लेकिन इनके प्रचार-प्रसार, ब्रांडिंग और संरक्षण की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं हो रहा।
वहीं दूसरी ओर, बाजारों में 30 से 40 रुपए किलो की दर से बिक रहे आमों में कैल्शियम कार्बाइड और इथीफोन जैसे रसायनों के प्रयोग की आशंका जताई जा रही है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। बावजूद इसके, खाद्य सुरक्षा विभाग और प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।
स्थानीय किसानों और आम उत्पादकों का कहना है कि जब ऐसे आयोजनों से स्थानीय उपज और उत्पादकों को मंच ही नहीं मिलता, तो इसका लाभ केवल औपचारिकता तक सीमित रह जाता है। ऐसे आयोजनों से यदि धरातल पर मंडला की असली उपज गुमनाम रह जाए, तो यह आयोजन सिर्फ दिखावा बन कर रह जाता है।
एक तरफ आमों का उत्सव, दूसरी तरफ सड़े हुए, केमिकल से पके आमों की बिक्री और मंडला की पहचान बने देसी आमों की उपेक्षा – यह स्थिति विडंबनापूर्ण ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक सोच और प्राथमिकता पर भी सवाल खड़े करती है। अब समय है कि मंडला की असली उपज को उसका हक और पहचान दिलाई जाए।
