ऑपरेशन सिंदूर शुरू हुए गुरुवार को एक वर्ष हो जाएगा. इस सफल सैन्य ऑपरेशन के अनुभव से सबक लेते हुए सरकार ने रक्षा तैयारियों का नया अध्याय प्रारंभ किया है.दरअसल,
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां पारंपरिक सैन्य ताकत के साथ-साथ तकनीकी श्रेष्ठता और बहु-आयामी युद्ध क्षमता को प्राथमिकता दी जा रही है. हालिया घटनाक्रम और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि आसमान, अंतरिक्ष और साइबर स्पेस में भी लड़े जाएंगे. ऐसे में भारत की रक्षा तैयारियों में हो रहा विस्तार एक रणनीतिक आवश्यकता के रूप में उभर रहा है.एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की संख्या बढ़ाने की तैयारी इसी सोच का हिस्सा है. यह केवल एक मिसाइल सिस्टम नहीं, बल्कि एक ‘एरिया डिनायल’ और ‘एयर डोमिनेंस’ की अवधारणा को साकार करने वाला प्लेटफॉर्म है. 400 किलोमीटर तक की मारक क्षमता और बैलिस्टिक मिसाइलों को हवा में ही नष्ट करने की इसकी क्षमता भारत को एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान करती है. यदि सरकार 5 नए स्क्वॉड्रन जोड़ती है, तो यह न केवल भारत के रणनीतिक ठिकानों को सुरक्षित करेगा, बल्कि दुश्मन के हौसले को भी शुरुआती स्तर पर ही तोडऩे का काम करेगा.
हालांकि, केवल हथियारों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है. ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने यह भी दिखाया कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन और स्वार्म टेक्नोलॉजी कितनी बड़ी चुनौती बन चुकी है. पाकिस्तान द्वारा एक ही रात में सैकड़ों ड्रोन्स का इस्तेमाल इस बात का संकेत है कि सस्ते लेकिन प्रभावी हथियार भविष्य के युद्ध की दिशा तय करेंगे. ऐसे में भारत का एंटी-ड्रोन सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी तंत्र को मजबूत करना अनिवार्य हो गया है.
इसी कड़ी में तीनों सेनाओं के लिए ‘जॉइंट ऑपरेशंस कंट्रोल सेंटर’ की स्थापना एक ऐतिहासिक कदम माना जा सकता है. लंबे समय से यह महसूस किया जा रहा था कि थल, जल और वायु सेना के बीच बेहतर समन्वय के बिना आधुनिक युद्ध में निर्णायक बढ़त हासिल करना मुश्किल है. एकीकृत कमांड और कंट्रोल सिस्टम न केवल त्वरित निर्णय लेने में मदद करेगा, बल्कि संसाधनों के बेहतर उपयोग को भी सुनिश्चित करेगा. भविष्य में भूमिगत कमांड सेंटर की योजना इस दिशा में भारत की गंभीरता को और भी स्पष्ट करती है.
लेकिन सबसे बड़ा अंतर जिस क्षेत्र में दिखाई देता है, वह है अंतरिक्ष आधारित निगरानी. चीन के पास हजारों सैटेलाइट्स और उनमें सैकड़ों सर्विलांस के लिए समर्पित हैं, जबकि भारत अभी इस क्षेत्र में पीछे है. यह अंतर केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि सामरिक बढ़त का है. युद्ध के दौरान रियल-टाइम इंटेलिजेंस और निगरानी ही सफलता की कुंजी होती है. ऐसे में 52 नए उपग्रहों का प्रस्तावित नेटवर्क भारत के लिए ‘गेम चेंजर’ साबित हो सकता है.
स्पष्ट है कि भारत अब केवल रक्षात्मक रणनीति तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि एक सक्रिय और बहु-स्तरीय सुरक्षा ढांचा विकसित कर रहा है. हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में आत्मनिर्भरता, तकनीकी नवाचार और समयबद्ध क्रियान्वयन सबसे महत्वपूर्ण होंगे. रक्षा तैयारियों का यह विस्तार केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक स्थिर और सुरक्षित भारत की दिशा में आवश्यक निवेश है. जाहिर है केंद्र सरकार बाहरी सुरक्षा के मामले में किसी प्रकार का जोखिम लेने के पक्ष में नहीं है.
