टकराव और हंगामे की भेंट चढ़ रही निगम परिषद

ग्वालियर चंबल डायरी
हरीश दुबे
मौजूदा ग्वालियर निगम परिषद में यद्यपि अनुभवी एवं कई मर्तबा मेंबरी कर चुके ऐसे पार्षदों की कमी नहीं है जो निगम एक्ट की बारीक जानकारियों से लेकर परिषद की कार्यप्रणाली और जनापेक्षाओं की गहरी समझ रखते हैं लेकिन परिषद में दोनों ही तरफ हल्ला बिग्रेड का वर्चस्व है और परिषद की बैठकें हंगामे की भेंट चढ़ रही हैं। परिषद की ताजा बैठकों में इसी हंगामे का नजारा देखने को मिला। दरअसल, परिषद में भाजपा का बहुमत है लेकिन महापौर की आसंदी पर कांग्रेस की शोभा सिकरवार विराजी हैं। मेयर इन काउंसिल पर कांग्रेस का कब्जा है।

संख्या बल के हिसाब से बहुमत में होते हुए भी भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ रहा है। परिषद में आए दिन बन रही टकराव और हंगामे की एक बड़ी वजह यही है। कांग्रेस शासित निगम परिषद में कोई भी प्रस्ताव पारित कराने में कांग्रेस के रणनीतिकारों को हर बार खासी मशक्कत करना पड़ती है और इसमें सफलता मिल ही जाए, इस बात की संभावना कम ही रहती है। इस बार यही हुआ। भाजपा पार्षदों के विरोध के चलते महापौर की निधि नहीं बढ़ सकी। भाजपा पार्षदों के लपेटे में उन्हीं की पार्टी के सभापति मनोज तोमर भी आ गए। भाजपा ने महापौर के साथ सभापति की निधि बढ़ाने के प्रस्ताव की भी मुखालिफत की।

इन पार्षदों ने एकजुट होकर नगर की प्रथम नागरिक और सभापति की निधि बढ़ाए जाने पर तो जमकर हंगामा काटा लेकिन अपनी मौलिक निधि बिना कोई अड़ंगे के बढ़वा ली। बजट संशोधन बैठक में चार संशोधन प्रस्ताव पर चर्चा होनी थी जिसमें महापौर, अध्यक्ष एवं पार्षद की मौलिक निधि बढ़ाने के प्वाइंट शामिल थे। महापौर एवं अध्यक्ष की निधि पूर्व के वर्षों की भांति यथावत रखने एवं पार्षद निधि 1 करोड 15 लाख रूपये करने तथा स्वेच्छानुदान निधि को समाप्त करने के निर्णय वोटिंग कराकर लिए गए। संशोधन प्रस्ताव के पक्ष में 38 वोट हाथ खडे करके डाले गए। ऐसा प्रतीत होता है कि परिषद को भाजपा पार्षद ही चला रहे हैं। हालांकि हाउस में संख्याबल के लिहाज से कांग्रेस बहुत ज्यादा पीछे नहीं है लेकिन पूर्ण बहुमत न होने के कारण सत्तासीन पार्टी को हर दफा मुंह की खानी पड़ रही है। भाजपा पार्षद दल भी गुटों में बिखरा है। भाजपा पार्षदों और सभापति की नोंकझोंक से इस बात का अंदाजा लगाया भी जा सकता है।

कृष्णराव दीक्षित का कांग्रेस से मोहभंग

बात निगम परिषद की चली है तो इन दिनों सरगर्म एक खबर का जिक्र जरूरी है। परिषद में प्रतिपक्ष के नेता रह चुके कांग्रेस के तेजतर्रार चेहरे कृष्णराव दीक्षित कभी भी भाजपा में शामिल हो सकते हैं। खबर है कि महल ने उनके नाम पर हरी झंडी दे दी है। ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर और इसी विधानसभा क्षेत्र के नेता अशोक शर्मा इसके लिए प्रयासों में जुटे हैं। प्रद्युम्न और अशोक जब महाराज संग भाजपा में गए तो कृष्णराव दीक्षित कांग्रेस में ही रह गए थे और महापौर शोभा सिकरवार के सलाहकार की भूमिका निभा रहे थे। करीब तीन बार पार्षद रह चुके दीक्षित की निगम एक्ट पर खासी पकड़ है, यही वजह है कि विधायक सतीश सिकरवार ने अपना प्रतिनिधि बनाकर उन्हें परिषद में प्रवेश कराया था लेकिन ताजा खबर है कि उनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया है और उनका अगला राजनीतिक पड़ाव कमल दल में ही होगा।

खटाई में पड़ा गर्मियों का मेला

मेला प्राधिकरण ने इस बार ग्वालियर मेला में समर फेयर लगाने की स्कीम बनाई थी। सर्दियों का मेला खत्म हुए बीस दिन होने को आए और गर्मियां भी शुरू हो गईं हैं लेकिन प्रतीत होता है कि मेला प्राधिकरण का इस बार समर फेयर लगाने का कोई विचार नहीं है। मेला प्राधिकरण के सूत्र तर्क दे रहे हैं कि खुद व्यापारी नहीं चाहते कि समर फेयर लगे। इस बात में सच्चाई भी हो सकती है। इस बार ग्वालियर ट्रेड फेयर अपने निर्धारित समय पर ही खत्म हुआ। हर साल मेला व्यापारी संघ मेला की अवधि बढ़ाने के लिए दवाब बनाता था लेकिन इस बार मेला व्यापारियों की ओर से समयावधि बढ़ाने की कोई मांग नहीं की गई। व्यापारियों की ओर से मांग नहीं उठी तो प्राधिकरण द्वारा भी मेले को एक्सटेंशन नहीं दिया गया। प्रस्तावित समर ट्रेड फेयर को लेकर भी दोनों तरफ से ऐसी ही उदासीनता देखने को मिल रही है, लिहाजा गर्मियों का मेला खटाई में है।

निगम बोर्डों पर फिर टिकी नजरें

एक बार फिर से निगम, बोर्ड और प्राधिकरणों में राजनीतिक नियुक्तियों की सुगबुगाहट तेज हो गई है। भाजपा के स्थानीय दिग्गज नेता निगम बोर्ड में जगह बनाने के लिए दिल्ली भोपाल के आला नेताओं की गणेश परिक्रमा में जुटे हैं। ग्वालियर में जीडीए और मेला व साडा के प्राधिकरण भी खाली पड़े हैं। इन पर भी नेताओं की नजर है।

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