सात हजार भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर हैंः टिम कर्टिस

नयी दिल्ली, 21 फरवरी (वार्ता) यूनेस्को क्षेत्रीय कार्यालय (दक्षिण एशिया) के निदेशक टिम कर्टिस ने कहा है कि शोध से पता चलता है कि सात हजार से ज़्यादा भाषाएं खतरे में हैं, जिनमें देसी भाषाएं सबसे ज़्यादा खतरे में हैं।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के कलानिधि प्रभाग ने शुक्रवार को 21-25 तक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस समारोह का आयोजन किया है। यह अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का रजत जयंती वर्ष है और इस वर्ष की थीम है- ‘मेक लैंग्वेजेज काउंट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ (सतत विकास के लिए भाषाओं को महत्व दें)। इस दौरान, एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘इंडियन कैलिग्राफी: अनवीलिंग एंशियंट विज्डम थ्रू राजीव कुमार्स आर्ट’ का लोकार्पण किया गया। इसके अलावा, एक अनूठी प्रदर्शनी ‘भाषाकृति’ का भी आयोजन किया गया है, जिसे सुश्री आशना और सुश्री ऋतु माथुर ने क्यूरेट किया है।

मुख्य अतिथि श्री कर्टिस ने कहा, ‘अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाना बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन भाषाओं का सम्मान करता है, जो हमारे विचारों और शब्दों को आकार देती हैं। संचार के साधनों से कहीं ज़्यादा, भाषाएं पहचान को परिभाषित करती हैं और व्यक्तियों को उनके इतिहास तथा समुदायों से जोड़ती हैं।’

दक्षिण एशिया के समृद्ध भाषाई परिदृश्य पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा, ‘शोध से पता चलता है कि सात हजार से ज़्यादा भाषाएं खतरे में हैं, जिनमें देसी भाषाएं सबसे ज़्यादा खतरे में हैं।’

इस मौके पर केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव लिलि पांडेय, आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, आईजीएनसीए के कलानिधि विभाग के अध्यक्ष व डीन (प्रशासन) प्रो. रमेश चन्द्र गौड़ सहित अन्य गणमान्य उपस्थित थे।

डॉ. जोशी ने कहा, “दुनिया भर में सबसे ज़्यादा भाषाओं और बोलियों वाला देश भारत में भाषाएं अब तेजी से समाप्त होने की कगार पर हैं। यह एक गंभीर चिंता का विषय है। हम सभी भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक कदम उठा रहे हैं, जैसा कि हमने देखा है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जहां तक संभव हो, शिक्षा में मातृभाषा के उपयोग पर जोर दिया गया है।’

प्रो गौड़ ने कहा, “किसी की भाषा को लेकर कोई असहमति नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के मद्देनजर अंग्रेजी में बातचीत करने वाले लोगों का प्रतिशत काफी बढ़ा है, लेकिन यह चिंता का विषय नहीं है। चिंता का विषय यह है कि लोग अपनी मातृभाषा में बात करने से परहेज कर रहे हैं।’

यहां आयोजित तीन चर्चा सत्रों में से पहला सत्र ‘मेक लैंग्वेजेज काउंट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ विषय पर था जिसका संचालन प्रो. रमेश चन्द्र गौर ने किया। दूसरे सत्र में ‘इंडियन कैलिग्राफी: अनवीलिंग एंशियंट विज्डम थ्रू राजीव कुमार आर्ट’ पुस्तक पर चर्चा की गई और तीसरे सत्र में ‘नई शिक्षा नीति एवं भारतीय भाषाएं’ विषय पर परिचर्चा हुई।

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