नयी दिल्ली 10 जनवरी (वार्ता) केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ को दूर करने के लिए अंतर-क्षेत्रीय सहयोग, उन्नत शोध और नवीन उपायों की आवश्यकता पर बल दिया है।
श्रीमती श्रीवास्तव ने तेलंगाना के हैदराबाद में गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला काे संबोधित करते हुए कहा कि गैर संचारी मौजूदा समय में व्यापक स्तर पर स्वास्थ्य समस्या हैं। इसने निपटने के लिए अंतर क्षेत्रीय और जागरुकता की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि गैर संचारी रोगों से निपटने के लिए उन्नत शोध और नवाचार पर जोर दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सरकार के ‘स्वस्थ भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक सभी की पहुंच और गैर-संचारी रोगों से होने वाली असामयिक मृत्यु दर में कमी ला महत्वपूर्ण है।
यह कार्यशाला केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने तेलंगाना सरकार के सहयोग से 8-9 जनवरी को हैदराबाद में आयोजित की गयी। इसमें प्रधान सचिवों (स्वास्थ्य), राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के मिशन निदेशक और सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अन्य वरिष्ठ अधिकारी, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और देशभर के नीति निर्माताओं ने भाग लिया। चर्चा में गैर-संचारी रोगों की रोकथाम, जांच, प्रबंधन और उपचार के लिए रणनीतियों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया गया।
कार्यशाला में मधुमेह, उच्च रक्तचाप, क्रोनिक किडनी रोग (सीकेडी), क्रोनिक श्वसन रोग (सीआरडी), नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर रोग (एनएएफएलडी), स्ट्रोक और कैंसर सहित गैर-संचारी रोगों के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक चर्चा और अनुभव सत्र शामिल थे।
कार्यशाला में ‘फिट इंडिया’ और ‘ईट राइट इंडिया’ जैसे अभियानों की भूमिका पर बल दिया गया। नागालैंड में तंबाकू उन्मूलन और नशा मुक्ति पहल और तेलंगाना के योग तथा स्वास्थ्य प्रणालियों के एकीकरण को अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया गया।
भारत वर्तमान में गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) में अभूतपूर्व वृद्धि का सामना कर रहा है और पूरे देश में होने वाली सभी मौतों में इसकी हिस्सेदारी 66 प्रतिशत से अधिक है। तेजी से बदलते जनसांख्यिकीय और महामारी विज्ञान परिदृश्य के साथ, हृदय रोग, मधुमेह, पुरानी श्वसन संबंधी बीमारियों और कैंसर जैसे रोग खासकर 30 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों के बीच महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन गए हैं।
