सात न्यायाधीशों की नियुक्तिमामले में लिखित बहस दाखिल

जबलपुर: हाईकोर्ट में सात अधिवक्ताओं को न्यायाधीश नियुक्त करने की संस्तुति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका में शुक्रवार को याचिकाकर्ता की ओर से लिखित बहस दाखिल कर दी गई। इसमें न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व की कमी को संवैधानिक मूल्यों के प्रतिकूल बताते हुए करिया मुंडा समिति की रिपोर्ट और केशवानंद भारती मामले के फैसले का हवाला दिया गया है।
ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से दायर याचिका में 26 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट कालेजियम द्वारा हाई कोर्ट के लिए सात अधिवक्ताओं के नामों की संस्तुति को चुनौती दी गई है। पांच नवंबर को मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने सुनवाई के बाद लिखित तर्क प्रस्तुत करने की अनुमति दी थी।
याचिकाकर्ताओं ने करिया मुंडा समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उच्च न्यायपालिका में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की आवश्यकता बताई है। वहीं, केशवानंद भारती फैसले के आधार पर सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों को संविधान के मूल ढांचे से जोड़ते हुए प्रतिनिधित्व में असंतुलन का मुद्दा उठाया है। लिखित बहस में दावा किया गया है कि हाई कोर्ट के 38 न्यायाधीशों में 36 सामान्य वर्ग से हैं और अनुसूचित जनजाति का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। प्रदेश की आबादी में ओबीसी की हिस्सेदारी 51, अनुसूचित जाति की 16 और अनुसूचित जनजाति की 21.21 प्रतिशत बताई गई है।

संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत नियुक्ति प्रक्रिया में प्रभावी परामर्श की अनिवार्यता का सवाल भी उठाया गया है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि राष्ट्रपति भवन और राज्य के विधि विभाग को भेजे गए अभ्यावेदनों पर निर्णय की प्रतीक्षा किए बिना संस्तुति कर दी गई। अब मामले में हाई कोर्ट के आगामी रुख पर निगाह रहेगी। कालेजियम ने डा. विवेक शरण, राजेश कुमार शुक्ला, कनक गहरवार, भक्ति व्यास, श्रेयस पंडित, मृणाल एलकर और अविनाश जरगर के नामों की अनुशंसा की है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, विनायक प्रसाद शाह, परमानंद साहू, उदय कुमार सहित नौ अधिवक्ता पैरवी कर रहे हैं

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