
उज्जैन। दीपावली पर आज हर घर में तरह-तरह की मिठाइयां और व्यंजन बनते हैं। बाजार मिठाइयों से भरे पड़े हैं, लेकिन पांच दशक पहले जब गांवों और शहरों में मिष्ठान की दुकानें न के बराबर हुई करती थीं, तब दिवाली का असली स्वाद कुछ और ही था।
शादी-विवाह या किसी बड़े त्योहार पर ही मिठाई देखने को मिलती थी। करीब 50 वर्ष पहले दिवाली आते ही बाजारों में मिठाई की जगह चीनी से बने रामकड़ों का कब्जा हो जाता था। जिले के तहसील व गांवों की छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बाज़ार तक हाथी, घोड़ा, ऊंट, शेर, चिडिय़ा, हंस, मोर, मंदिर जैसे रंग-बिरंगे खिलौने सजे नजर आते थे। इनके कारीगर बड़े मन से चीनी को पिघलाकर मिट्टी के सांचों में ढालकर तैयार करते थे। सफेद चमकदार यह खिलौने बच्चों के लिए दिवाली का सबसे बड़ा आकर्षण हुआ करते थे। बच्चे इन्हें पहले खेलते, फिर संभालकर खाते थे। विशेष रूप से दिवाली के बाद दिपावली की धोक में इसका महत्व और बढ़ जाता था। घर-घर दीपावली पर मिलने आने वाले बच्चों को मिठाई की जगह यही चीनी के खिलौने बांटे जाते थे।
इनकी जगह मिठाई और चाकलेट ने ले ली
समय बदला, जमाना बदला और धीरे-धीरे इन रामकड़े की जगह बंगाली मिठाइयों, मेवे की मिठाइयों और चॉकलेट ने ले ली। लेकिन गांवों में आज भी इनकी झलक बाकी है। शहर के चीनी व्यापारी जितेन्द्र माहेश्वरी बताते हैं कि आज भी दीपावली के सीजन में गांवों से छोटे व्यापारी चीनी के खिलौने खरीदते हैं। इस बार दीपावली सीजन में चीनी खिलौने 73 से 78 रुपये प्रति किलो के भाव से बिक रहे हैं।
