खैरलांजी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एंबुलेंस सेवा ठप

खैरलांजी, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र खैरलांजी में एंबुलेंस सेवा की बदहाल व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सड़क दुर्घटना में घायल एक युवती को बेहतर उपचार के लिए जिला अस्पताल बालाघाट रेफर किए जाने के बाद एंबुलेंस उपलब्ध नहीं होने से लगभग तीन घंटे तक इंतजार करना पड़ा। इस दौरान मरीज की हालत बिगड़ने की बात सामने आई है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि समय पर एंबुलेंस नहीं मिलती और मरीज की जान पर बन आती है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

प्राप्त जानकारी के अनुसार,25 अक्टूबर को रात्रि लगभग 8 बजे लालबर्रा निवासी विस्मिता , पिता रविशंकर, नागपुर से अपने गांव लालबर्रा जा रहे थे। इसी दौरान खैरलांजी से लगभग दो किलोमीटर दूर नवेगांव में उनकी मोटरसाइकिल दुर्घटनाग्रस्त हो गई। हादसे में घायल को उपचार के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र खैरलांजी लाया गया। यहां उपचार के दौरान मरीज की स्थिति को देखते हुए डॉक्टर ने उसे जिला अस्पताल बालाघाट रेफर कर दिया।

अस्पताल परिसर में खड़ी एंबुलेंस, मरीज करता रहा इंतजार

मरीज को रेफर किए जाने के बाद जब एंबुलेंस की जरूरत पड़ी, तो अस्पताल में उपलब्ध जननी 108 और अन्य दो एंबुलेंस के बंद होने की जानकारी सामने आई। इसके चलते मरीज को दूसरी एंबुलेंस की व्यवस्था होने तक लगभग तीन घंटे इंतजार करना पड़ा। आरोप है कि इस देरी के दौरान मरीज की हालत और बिगड़ती गई। आपातकालीन स्थिति में इस तरह की देरी स्वास्थ्य सेवाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

जनप्रतिनिधियों द्वारा दी गई एंबुलेंस का क्या हो रहा उपयोग?

बताया जाता है कि पूर्व मंत्री प्रदीप जायसवाल द्वारा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र खैरलांजी को एक एंबुलेंस उपलब्ध कराई गई थी। वहीं, पूर्व विधायक टामलाल सहारे द्वारा भी अस्पताल को एक एंबुलेंस प्रदान किए जाने की जानकारी सामने आई है। इसके बावजूद मरीज को समय पर एंबुलेंस नहीं मिलना व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। इन वाहनों की वर्तमान स्थिति, रखरखाव और संचालन को लेकर संबंधित विभाग से स्पष्ट जानकारी सामने आना आवश्यक है।

एंबुलेंस चालक की ड्यूटी पर भी उठे सवाल

मामले में तूफान एंबुलेंस के चालक मनोज माहुले की ड्यूटी को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि एंबुलेंस चालक को बीएमओ डॉ. खिलेंद्र पाल के निजी वाहन के संचालन में लगाया गया है। यदि यह आरोप सही है, तो यह जांच का विषय है कि सरकारी व्यवस्था के लिए नियुक्त चालक की ड्यूटी निजी वाहन पर किस आदेश से लगाई गई और इस दौरान एंबुलेंस सेवा का संचालन किसके जिम्मे था।

जिम्मेदारी तय होगी या मामला दब जाएगा?

इस पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को एंबुलेंस की उपलब्धता, खराब वाहनों की स्थिति, चालक की ड्यूटी और मरीज को रेफर करने के बाद हुई देरी की जांच करानी चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि सरकारी संसाधनों का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप हो रहा है या नहीं।

आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा में एंबुलेंस केवल एक वाहन नहीं, बल्कि मरीज को समय पर उपचार तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण साधन है। ऐसे में खैरलांजी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सामने आई इस घटना ने व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस मामले की जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई करता है या मरीजों को इसी तरह परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।

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